रेलवे का हो प्राईवेटाईजेशन
-यात्रियों के सुहाने सफ़र का सपना नहीं हो रहा है पूरा
-मुंबई लोकल में १० साल में ३६ हज़ार यात्रियों की मौत
-प्राईवेट ट्रेनों से होगा कोम्पीटीशन
-कई राज्यों में परिवहन निगम की बसें बंद
-निजी बसों ने संभाली सड़क परिवहन की कमान
-प्राईवेटाईजेशन से हर हाथ में है सेल फोन
-एयर इंडिया को ३० हज़ार करोड़ का पैकेज
अमीन कुरेशी
मुंबई. खाचाखच भरीं मुंबई की लोकल ट्रेने, ट्रेन से गिरकर रोज़ होने वाली
बेगुनाह यात्रियों की मौत, बच्चों, बुजुर्गों और महिलायों के लिए पीक अवर
में नामुमकिन सफ़र, लोकल और मेल गाड़ियों के आये दिन होने वाले जानलेवा
एक्सीडेंट, रेल कर्मियों की मक्कारी, रेल और स्टेशनों पर गंदगी, मेल
ट्रेनों में ३-३ माह पहले भी टिकट ना मिलना, बीमारी, मौत, एग्जाम और शादी
जैसे जरूरी कामों में समय पर न पहुँच पाना जैसी अनगिनत तकलीफें हैं जिसके
मद्देनज़र अब भारतीय रेल का निजीकरण कर देना चाहिए.
आप को याद होगा
क्योंकि यह बहुत दिनों पुरानी बात नहीं है जब घर में टेलीफोन होना स्टेटस
सिम्बल मना जाता था. क्योंकि टेलीफोन सिर्फ दो सरकारी कम्पनियाँ एम टी एन
एल और बी एस एन एल ही प्रदान करती थीं. काल की दरें अधिक होती थीं.फोन के
लिए दो पाँच हजार रूपए जमा करने होते थे. लम्बी वैटिंग लिस्ट होती थी या
सांसद कोटे से फोन मिलते थे. लेकिन जब से टेलीफोन का प्राईवेटाईजेशन हुवा
है तब से हर आम आदमी के पास एक नहीं दो दो फोन हो गए हैं. मुफ्त में सिम
कार्ड मिल रहें है. काल की दरें प्रति पैसे प्रति सेकण्ड पर आ गयी हैं.एम
टी एन एल और बी एस एन एल की सेवाओं में भी सुधार हुआ है. प्राईवेटाईजेशन से
रेल का टिकट और सफ़र भी इतना ही सुगम हो सकता है. प्राईवेटाईजेशन के बाद
टेलीफोन की तरह रेल में भी टिकट पाने के लिए वीआईपी कोटे की ज़रुरत नहीं
पड़ेगी. प्राईवेटाईजेशन के बाद वर्तमान रेल विभाग में सुधार होगा.
पूरे
देश में बिना टिकट यात्रा का आंकड़ा मुंबई में सबसे कम है. सर्वाधिक
राजस्व मुंबई से मिलता है. यात्रियों की ५० % संख्या मुंबई में है फिर भी
सबसे बुरा हाल मुंबई के मुसाफिरों का है. रोज़ उनकी बली ली जाती है. सिग्नल
ख़राब होने पर दो दिन तक लोकल बंद रहती है. सिग्नल से टकराकर यात्री मर
जाते है. भीड़ के कारण चलती ट्रेन से गिर कर मर जाते है. इसकी परवाह किसे
है? देश में नहीं तो कमसे कम मुंबई में लोकल ट्रेनों का प्राईवेटाईजेशन
किया जाना चाहिय. क्योंकि लोकल ही मुंबई की लाइफ लाइन है. देश में भी नए
रेल मार्गों का काम निजी कंपनियों को को सौंपना चाहिए.
सड़क परिवहन में
भी सरकारी बसों के जर्जर होने के बाद आखिरकार प्राईवेट बसें ही यात्रियों
मंजिल तक पहुंचा रहीं है. निजी कंपनियों के आने बाद ही सस्ते टिकटों पर
हवाई यात्रा का आम आदमी का सपना पूरा हुवा है. सरकारी एयर लाईन्स ३०- ३०
हज़ार करोड़ के पैकेज के बाद भी उड़ नहीं पा रहीं हैं क्योंकि देश के कर
दाताओं के पैसे से दिया गया पैसा भ्रष्टाचार और सरकारी बाबुओं की हरामखोरी
में उड़ जाता है. इन्ही बाबुओं के घर जब छपे पड़ते हैं तो करोड़ों रूपये
बरामद होते हैं. आज चाहे सरकारी स्कूल हो या अस्पताल कोई जाना नहीं चाहता
लेकिन सब नौकरी सरकारी चाहते हैं. क्योंकि वहां बिना काम के मोटी पगार और
जेब भरके रिश्वत मिलती है.