मुसलमानों का एजेंडा सिर्फ शिक्षा हो
-आबादी में १५ % हैं मुस्लमान.
-२५ % बच्चे स्कूल नहीं जाते.
-ड्राप आउट रेट सबसे अधिक.
-आई आई टी में सिर्फ १%
-ग्रेजुएशन की दर मात्र ३%
- सरकारी नौकरी में २.३%
-२५ % बच्चे स्कूल नहीं जाते.
-ड्राप आउट रेट सबसे अधिक.
-आई आई टी में सिर्फ १%
-ग्रेजुएशन की दर मात्र ३%
- सरकारी नौकरी में २.३%
भारत में शिक्षा के विकास के प्रतीक भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद कलाम का जन्मदिन रविवार को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया गया। देशभर के मुस्लिम शिक्षा संस्थानों में हुए समारोह में एक बार फिर मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक दशा और दिशा पर चिंतन मनन हुआ. इसका निचोड़ यह निकला कि मुसलमानों में शिक्षा और रोज़गार की ज़रुरत है. कई और सर सय्यद , मौलाना अबुल कलाम आजाद और गुलाम वस्तान्वी जैसे शिक्षाविदों की ज़रुरत है. शिक्षा आयेगी तो रोज़गार-कारोबार आयेगा, रोज़गार और कारोबार से सम्पन्नता आयेगी.
भारतीय मुसलमानों की अगर देश के अन्य समुदायों
से तुलना करें तो देखेंगे कि वे उनसे पीछे हैं. आर्थिक, सामाजिक और
शैक्षणिक सभी तरह से. तीनों हालात में वे भारत की उन जातियों से भी पीछे
हैं, जो अल्पसंख्यक कहलाती हैं. आज़ादी के समय सरकारी नौकरियों में
मुसलमानों की संख्या ३१ प्रतिशत थी जो अब २.३ प्रतिशत रह गयी है. इन 63
सालों के दौरान एक विशेष लक्ष्य के तहत अधिकारों से वंचित रखा गया. नतीजा
यह हुआ कि मुस्लमान अनुसूचित जनजाति से नीचे चले गए और भारत का मुसलमान यह
मांग करने पर मजबूर हो गया है कि उसे आरक्षण मिलना चाहिए.
मुस्लिम समाज आजादी के 63 साल बाद भी क्यों पिछडा रह गया और सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के क्षेत्र में लगातार पिछडने के क्या कारण है।मुस्लिम समाज के लोग बहुतायत में हाथ के हुनर का काम जानते है, चाहे चूडी बनाने का काम हो , बुनाई व हस्तशिल्प की कारीगरी हो , जैम्स एण्ड ज्वैलरी को चमकाने की कला हो और चाहे लकड़ी एवं लोहे के खिलौने बनाने की दस्तकारी हो हर क्षेत्र में मुस्लिम समाज अपनी कारिगरी के माध्यम से देश के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लेकिन विषेषकर दो समस्याओं के कारण अपने उत्पादन की क्षमता को बनाये रखने में असफल रहते है एक समस्या विपणन (मार्केटिंग) की है और दूसरी समस्या बैंक ऋण (क्रेडिट) की है यदि इन दोनो समस्याओ का समाधान हो जाये तो मुस्लिम समाज को तरक्की से कोई नहीं रोक सकता।
मुस्लिम समाज आजादी के 63 साल बाद भी क्यों पिछडा रह गया और सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के क्षेत्र में लगातार पिछडने के क्या कारण है।मुस्लिम समाज के लोग बहुतायत में हाथ के हुनर का काम जानते है, चाहे चूडी बनाने का काम हो , बुनाई व हस्तशिल्प की कारीगरी हो , जैम्स एण्ड ज्वैलरी को चमकाने की कला हो और चाहे लकड़ी एवं लोहे के खिलौने बनाने की दस्तकारी हो हर क्षेत्र में मुस्लिम समाज अपनी कारिगरी के माध्यम से देश के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लेकिन विषेषकर दो समस्याओं के कारण अपने उत्पादन की क्षमता को बनाये रखने में असफल रहते है एक समस्या विपणन (मार्केटिंग) की है और दूसरी समस्या बैंक ऋण (क्रेडिट) की है यदि इन दोनो समस्याओ का समाधान हो जाये तो मुस्लिम समाज को तरक्की से कोई नहीं रोक सकता।
दूसरी समस्या उत्पादन की प्रक्रिया में आवश्यकता
पडने पर बैंक से कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होने से संबंधित है । बैंको
द्वारा बिना गांरटी के लोन नहीं दिया जाता है और मुस्लिम समाज के आर्थिक
दृष्टि से कमजोर कारीगरों के पास गांरटी देने के लिए कोई संपत्ति भी नहीं
होती और इनको ऋण की मांग भी प्रायः एक लाख से कम ही होती है। ऐसी स्थिति
में गांरटी की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। और बैंको को स्पष्ट हिदायत दी
जानी चाहिए कि ऋण के लिए आवेदन पत्र प्राप्त होने पर निश्चित समय सीमा में
मुस्लिम कारीगरों को ऋण उपलब्ध हो सकें। इस समस्याओ का समाधान होने से
मुस्लिम समाज आर्थिक व सामाजिक उन्नति की सीढी चढ़ सकता है।मुस्लिम समाज
में आयोजित होने वाले सामुहिक विवाहों मे अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा
आर्थिक सहायता दिये जाने, मदरसों में कम्प्यूटर व अंग्रेजी शिक्षा की
समूचित व्यवस्था करने , सभी राज्यों मे आजीविका मिशन प्रारम्भ करने , सांसद
निधि कोष से एक निश्चित प्रतिशत राशि मुस्लिम समाज के मौहल्लों में खर्च
की जानी चाहिए.
शिक्षा के मामले में मुस्लिम औरतों की स्थिति सबसे बदतर है।भारत की पहली महिला शासक रज़िया सुल्तान, पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाजसेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में -बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं। लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल एक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है,इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81 है. मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।
शिक्षा के मामले में मुस्लिम औरतों की स्थिति सबसे बदतर है।भारत की पहली महिला शासक रज़िया सुल्तान, पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाजसेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में -बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं। लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल एक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है,इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81 है. मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।
पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने कहा था की अगर शिक्षा
लेने के लिए समुद्र पार और चीन भी जाना पड़े तो जाएँ. आपने गर्ल्स एजुकेशन
के सम्बन्ध में कहा था की तुमने अगर एक मर्द को पढाया तो मात्र एक व्यक्ति
को पढ़ाया। लेकिन अगर एक औरत को पढाया तो एक खानदान को और एक नस्ल को
पढ़ाया। लेकिन समाज ने इस पर अमल नहीं किया और उसका नतीजा सामने है.
भारतीय मुसलमानों का स्वभाव
दुर्भाग्य से भावनात्मक है. इस कारण राजनीतिक पार्टियों लंबे समय से समाज
का शोषण कर रहीं हैं. समाज के अधिकांश लोग विकास के बजाय भावनात्मक मुद्दों
को वरीयता देते हैं. मुसलमान अगर भावना से ऊपर उठकर शिक्षा को अपना एक
एजेंडाबना लें तो मुसलमानों का शोषण बंद हो सकता है. फिर मुसलमान अपनी लडाई
खुद लड़ सकता है. और अधिकारों की यह लडाई एक मुसलमान नहीं बल्कि एक भारतीय
की तरह होनी चाहिए.