आज़ादी की एक लड़ाई और
अमीन कुरेशी
भारत सरकार के सचिवों के समूह ने मल्टीब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब विदेशी कंपनियां मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 फीसदी तक निवेश कर सकेंगी। वाल-मार्ट, केयरफॉर और टेस्को जैसे अंतर्राष्ट्रीय रिटेल कारोबारियों के लिए भारत में साझेदारी के माध्यम से प्रवेश करना सम्भव हो जाएगा। मूल प्रस्ताव में राज्य सरकारों की मंजूरी लेना ज़रूरी था लेकिन अब यह शर्त भी हटा दी गयी है. इस राह में भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश विरोध कर सकते थे । इसके अलावा पश्चिम बंगाल में तृणमूल की सरकार भी मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई का विरोध कर रही है। औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग द्वारा कई विभागों के सदस्यों को मिलाकर बनाई गई समिति ने देश भर से इस मामले पर 175 लोगों की प्रतिक्रिया ली और उसका विश्लेषण किया। विश्लेषण में पता चला कि इस कदम का विरोध करने वाले 109 प्रतिभागियों में से 73 छोटे कारोबारी और रिटेल संगठन थे। इसके अलावा स्थानीय विनिर्माताओं और गैर सरकारी संगठनों ने भी पहल का विरोध किया है। जबकि फिक्की, सीआईआई और भारतीय रिटेल संगठनों ने मल्टीब्रांड में एफडीआई को कारोबार के लिए बेहतरीन पहल बताते हुए इसका समर्थन किया है।
हालांकि मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी के तहत 10 करोड़ डॉलर से कम विदेशी निवेश की इजाजत नहीं होगी। इसके अलावा मल्टीब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश का 50 फीसदी हिस्सा बैक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाना होगा। ईजीओएम की बैठक में मल्टीब्रैंड रिटेल स्टोर की कुल बिक्री का 30 फीसदी हिस्सा छोटे रिटेलर्स को बेचना का प्रस्ताव मंजूर हुआ है। इसके अलावा 10 लाख या उससे ज्यादा की जनसंख्या वाले शहरों में ही मल्टीब्रैंड रिटेल की छूट देने का प्रस्ताव है। हालांकि मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई के प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट कमिटी के पास भेजा जाएगा। इसके बाद संसद कें बहस होगी.
फिलहाल इस पर बहस जरी है. रिटेलर्स एसोसिएशन के मुताबिक मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई आने से सप्लाई चेन सुधरेगी और इससे महंगाई में कमी आएगी। इसके अलावा वेस्टेज भी कम होगा।वहीं फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी ने मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी पर खुशी जताई। किशोर बियानी के मुताबिक मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से देश के रिटेल कारोबार को काफी फायदा होगा। किशोर बियानी का मानना है कि मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से कई कंपनियां रिटेल सेक्टर में अपना कारोबार शुरू करने के लिए आगे आ सकती हैं। साथ ही मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से विदेशी कंपनियों को बड़ा बाजार मिलने की उम्मीद होगी।
मल्टीब्रैंड रिटेल में न्यूनतम 10 करोड़ डॉलर के एफडीआई को अनुमति दी है। इसके साथ ही एफडीआई वाले मल्टीब्रैंड स्टोर उन्हीं शहरों में खोले जा सकते हैं, जिनकी आबादी 2011 की जनगणना के आधार पर 10 लाख से अधिक है। 2001 की जनगणना के अनुसार इस दायरे में फरीदाबाद, वडोदरा, इंदौर, जबलपुर, अमृतसर, इलाहाबाद, वाराणसी, राजकोट समेत 35 शहर आते हैं। जबकि 2011 की जनगणना के आधार पर इन शहरों की संख्या और अधिक हो सकती है। हालांकि इस मामले पर पहले समिति में मतभेद थे लेकिन अब सभी राज्यों की राजधानियों में मल्टीब्रांड एफडीआई को अनुमति देने पर सहमति बनती नजर आ रही है। जबकि इससे पहले कुछ मंत्री इसे महज 6 महानगरों तक ही सीमित करने की सिफारिश कर रहे थे, जिससे इस पर आसानी से निगरानी रखी जा सके।
उद्योग जगत के जानकारों और आर्थिक सलाहकारों का मानना है कि मल्टीब्रैंड रिटेल क्षेत्र में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जहां एक ओर रिटेल क्षेत्र का आधुनिकीकरण होगा, वहीं महंगाई दर में भी कमी आएगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के महासचिव राजीव कुमार ने कहा, “”यह एक ब़डा फैसला है। हम चाहते हैं कि यह जल्द-से-जल्द शुरू हो।”" कुमार ने कहा कि इनके प्रवेश से भारत के रिटेल क्षेत्र में नयापन आएगा। इसके साथ ही इससे महंगाई दर भी घटेगी, जो आज एक ब़डी समस्या बन गई है। एसोचैम के महासचिव डी.एस. रावत ने कहा कि इस कदम से न सिर्फ विदेशी निवेशकों, बल्कि भारतीय निवेशकों के बीच भी अच्छा संकेत जाएगा, जो यह मानकर चल रहे थे कि सरकार ब़डा फैसला नहीं ले सकती है। रावत ने कहा, “”सरकार ने पिछले कुछ समय से ब़डा फैसला नहीं लिया था। यदि सरकार इस सुझाव को मानती है, तो इसका हर क्षेत्र में बेहतर संकेत जाएगा।”" उन्होंने हालांकि कहा कि यह तो सिर्फ पहला कदम है। इसे अभी कई बाधाएं पार करनी है। सचिवों की समिति ने अपना सुझाव मंत्रिमंडलीय समिति को भेज दिया है। अब प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रीमंडलीय समिति इस पर विचार करेगी। सरकार के लिए इस पर फैसला लेना कठिन होगा, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य कई विपक्षी पार्टियां यह कहकर इस कदम का विरोध कर रही हैं कि बहुराष्ट्रीय रिटेल कम्पनियां छोटे-मोटे दुकानदारों तथा कारोबारियों को बाजार से खदे़ड देंगी।
डिलॉयटी के निदेशक गौरव गुप्ता ने कहा, “”सुपरबाजारों के काम करने का तरीका छोटे कारोबारियों से अलग होता है। मैं नहीं समझता कि ये सुपरबाजार छोटे कारोबारियों के लिए खतरा हैं।”" गुप्ता ने कहा कि समिति ने कम से कम 10 करो़ड डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा तय की है, इसलिए छोटे कारोबारियों को खतरा नहीं है। समिति ने सुझाव दिया है कि कुल निवेश का कम से कम आधा हिस्सा शीत भंडार जैसे आधारभूत संरचना में निवेश होना चाहिए। देश में अभी एकल ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी और कैश एंड कैरी थोक कारोबार में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत है। वालमार्ट जैसी अंतर्राष्ट्रीय रिटेल कम्पनियों ने पहले से यहां रणनीतिक साझेदारी के तहत कैश एंड कैरी कारोबार शुरू कर दिए हैं और जल्द-से-जल्द अपने सुपरबाजार भी शुरू करना चाहती हैं।
लेकिन देश के आम लोगों की राय है कि गली -मोहल्ले की मोहन सेठ ,धरमू काका ,खान चाचा की दुकान, ये सब सपना बन कर रह जायेगी. अमेरिका को देश को लूटने की खुली छूट दी जा रही है.किराने की दुकान चला ने वाले ,रेहडी वाले ,ट्रांसपोर्टर ,हम्माल ,कर्मचारी बेरोजगार हो जायेगे.किसानो को भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा. इस देश मैं अब कोई विपक्ष बचा नहीं है. इस अमेरिकी लूट के लिए हमारी सरकार ने लूटेरो को देश की चाबी दे दी हैं.
भारतीय खुदरा कारोबार का एक अनोखा ढांचा है। राशनिंग के साथ शुरू हुआ इसका सफर कपड़ा और फुटवियर रिटेल से होकर गुजरा है। 1990 के दशक के आखिर में इसने तेजी पकड़ी। मौजूदा दौर में भी भारत दुकानदारों का देश है जहां करीब 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी कारोबार इनके जरिये ही होता है। बहुरास्ट्रीय कंपनियों की लालची नजर इस पर हैं.देश एक बड़े संकट की और बड़ रहा है. आज़ादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी थी और अब अमेरिकी कम्पनियाँ हैं. हो सकता है कि कुछ सालों बाद आज़ादी की एक लडाई और लड़ना पड़े.