Wednesday, 28 September 2011

डबल टैक्स, मल्टी मर्डर

डबल टैक्स, मल्टी मर्डर
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अमीन कुरेशी
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-२७ रुपये टैक्स ने ली जान ?
-रोड टैक्स है तो  टोल टैक्स क्यों ?
-पालिका में डबल टैक्स क्यों ? 
-और कितने लगेंगे टैक्स ?
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    हल ही में दिल्ली के पास एक्सप्रेस-वे पर टोल बैरियर पर तैनात एक कर्मचारी की बोलेरो सवार व्यक्ति ने गोली मार कर हत्या कर दी। इस गाड़ी में एक ही व्यक्ति सवार था। उमेश कांत ने उसे टोल देने के लिए कहा तो उसने टोल देने से मना कर दिया। टैक्स को लेकर दोनों में कहासुनी हो गई। बात बढ़ती देख उमेश कांत ने बूम को उठा दिया। जैसे ही बुम उठा तो बोलेरो सवार ने अपनी गाड़ी को कुछ आगे किया और हथियार निकाल कर उमेश कांत की गर्दन पर गोली मार दी। गोली लगते ही उमेश कांत अपने कैबिन में ही ढेर हो गया और बोलेरो सवार मौके से फरार हो गया।
 
   कर्मचारी की हत्या मात्र २७ रुपये टैक्स देने को लेकर की गई। हत्यारे पकड़े भी गए और सजा भी हो जाएगी. सवाल यह उठता है कि हमारी व्यवस्था के विरुद्ध समाज में जो गुस्सा और कुंठा भर गई है आखिर वह कहाँ निकले.  वैसे भी घर परिवार का तनाव लोगों पर पहले से हावी होता है और ऐसे में व्यवस्था की गड़बड़ी झेलते झेलते कुछ लोग अपना आप खो बैठते हैं.
 
   टोल बैरियर पर तैनात कर्मचारी की गोली मार कर हत्या का कारण युवकों ने टोल टैक्स बताया. उनका कहना है कि वे पास के गाँव में रहते हैं और दिन में दस बार उनको टोल नाका पार करना होता है. आखिर कब तक वे टोल टैक्स भरें. बात इन गांववालों की सही है. यह झगड़ा देश के हर कोने में टोल प्लाज़ा के पास के गाँव और बार बार आने जाने वाले टैक्सी  चालकों में होता है. अन्य टोल नाकों पर भी आन्दोलन और मारपीट आम बात होती जा रही है.
 
   टोल नाके को लेकर दो अहम् सवाल हैं. एक तो यह है कि जब सभी वाहन चालक मोटी रकम के रूप में लाइफ टाईम रोड टैक्स  भर देते हैं तो फिर  सड़क के उपयोग और मरम्मत के लिए अलग से टोल टैक्स क्यों वसूला जा रहा है. इस तरह से डबल टैक्स के प्रति  नागरिकों का गुस्सा स्वाभाविक है. परिवहन विभाग यो तो रोड टैक्स  ले या टोल टैक्स  ले. आज कल हर रोड पर टोल प्लाज़ा बन गए हैं. पांच  पच्चीस कि मी जाने आने पर जितना पेट्रोल नही लगता उससे ज्यादा टोल टैक्स  लग जाता है. इससे परेशान हो कर आसपास के गाँववालों अब टोल नाकों पर हिंसा शुरू कर दी है.
 
     डबल टैक्स  की मार सिर्फ सड़क पर ही नही है. कई अन्य जगह भी यह घुमा फिरा कर वसूला जा रहा है.  निकायों अर्थात पालिका की तरफ से भी तीन टैक्स डबल वसूले जाते हैं. पहला है एजुकेशन टैक्स. पालिका के बिल यह दो तरह से वसूला जाता है. एक तो पालिका का एजुकेशन टैक्स और दूसरा राज्य सरकार का एजुकेशन टैक्स. फिर भले ही उस पालिका के एरिया में राज्य सरकार का कोई स्कूल न हो और पालिका के स्कूल में आपका बच्चा न पड़ता हो. डबल टैक्स आपको भरना ही है. इसी तरह जल-मल निकासी टैक्स अर्थात सीवेज टैक्स और सीवेज बेनिफिट टैक्स. इसी तरह सफाई शुल्क और विशेष सफाई शुल्क.  
 
पालिका, राज्य सरकार और केंद्र सरकार का दर्ज़नों टैक्स लेने के बाद भी पेट नहीं भर रहा है. इसलिय टैक्स वसूलने के नए नए रास्ते खोजे जाते हैं और इन रास्तों पर अब खून बहने लगा है.  
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Saturday, 10 September 2011

पाकिस्तान का नया बम

पाकिस्तान का नया बम
अमीन कुरेशी
पाकिस्तान का नया बम , पाकिस्तान को मिला एक नया खुफिया हथियार, पाक बम भारत आया....और इस तरह की कई अन्य सुर्खियाँ  अख़बारों में पड़ने को मिलीं, जब पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर ने भारत का दौरा किया. हिना ने अपनी खूबसूरती, अदा, अंदाज़ और फेशन से न सिर्फ मीडिया का दिल जीता बल्कि राजनेताओं से भी कूटनीतिक रिश्ते बनाने में भी सफल रहीं.
हिना रब्बानी खर अपने देश की पहली महिला विदेश मंत्री हैं जो इस्लामाबाद की छवि सुधारने में सफल होती दिख रहीं है. संभवतः पाकिस्तान का कोई कट्टर छवि वाला पुरुष नेता यह  चमत्कार नहीं कर पता. जिस तरह से कम्पनियाँ मार्केटिंग के लिए खूबसूरत महिला एक्सिकिटिव के जरिये कारोबार में इजाफा करतीं हैं उसी तरह पाकिस्तान ने इस मार्केट मंत्र का इस्तेमाल अपने कूटनीतिक रिश्ते सुधारने के लिया बखूबी किया है.
मुंबई में बम विस्फोट कि  छाया में हिना ने भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्ण से आत्मविश्वास के साथ हाथ मिलाते हुए घोषणा की कि ये एक नए युग की शुरुआत हैं. इससे भारत-पाक के बीच कश्मीर मुद्दे पर नजदीकी आई है. रियायतों पर रजामंदी  हुई है , जो कश्मीर विवाद को नरम करने में मददगार हो सकते हैं. भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर दूसरी बातों के अलावा इस पर सहमत रहे कि कश्मीर के दोनों हिस्सों में व्यापार को बढ़ाया जाए. इसके अलावा विभाजित इलाके में रहने वाले लोग एक दूसरे इलाके में आसानी से जा आ सकेंगे.
हिना ने कहा है कि वे पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी जनता की ओर से शुभकामनाएँ लेकर  आई हैं.दोनों देशों ने इतिहास से बहुत कुछ सीखा है. आशा है कि हम अच्छे,  पड़ोसी के रूप में आगे बढ़ सकते हैं.एक-दूसरे के भविष्य में हमारी हिस्सेदारी है और दोनों देश क्षेत्र के प्रति और क्षेत्र के अंदर अपनी जिम्मेदारियों को महसूस करते हैं.
कुल मिला कर यह  एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत है. पाकिस्तान और उसकी विदेश मंत्री ने मीडिया और नेताओं पर अच्छी छाप छोड़ी है. चाहे पाकिस्तान हो या बंगला देश कट्टरता के बावजूद वहां राजनीती के शिखर पर महिलाएं ही अपना परचम लहरातीं है. हिना भी बेनजीर की तरह एक दिन पाक की शीर्ष नेता होंगी.हिना का आकर्षण और कम  उम्र पाकिस्तान को एक नरम छवि देने में मदद दे सकता है.  कुरूप देश का यह सुंदर चेहरा विश्व की सबसे युवा विदेश मंत्री के लिए कुछ भी ऐसा नहीं जो हासिल नहीं किया जा सके बशर्ते विदेश और सुरक्षा नीति में पाक सेना का दखल न हो और हिना को आज़ादी मिले खिलने की और पूरी दुनिया में महकने की.
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आज़ादी की एक लड़ाई और

आज़ादी की एक लड़ाई और
अमीन कुरेशी
भारत सरकार के सचिवों के समूह ने मल्टीब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब विदेशी कंपनियां   मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 फीसदी तक निवेश कर सकेंगी।  वाल-मार्ट, केयरफॉर और टेस्को जैसे अंतर्राष्ट्रीय रिटेल कारोबारियों के लिए भारत में साझेदारी के माध्यम से प्रवेश करना सम्भव हो जाएगा। मूल प्रस्ताव में राज्य सरकारों की मंजूरी लेना ज़रूरी था लेकिन अब यह शर्त भी हटा दी गयी है. इस राह में भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश विरोध कर सकते थे । इसके अलावा पश्चिम बंगाल में तृणमूल की सरकार भी मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई का विरोध कर रही है। औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग द्वारा कई विभागों के सदस्यों को मिलाकर बनाई गई समिति ने देश भर से इस मामले पर 175 लोगों की प्रतिक्रिया ली और उसका विश्लेषण किया। विश्लेषण में पता चला कि इस कदम का विरोध करने वाले 109 प्रतिभागियों में से 73 छोटे कारोबारी और रिटेल संगठन थे। इसके अलावा स्थानीय विनिर्माताओं और गैर सरकारी संगठनों ने भी पहल का विरोध किया है। जबकि फिक्की, सीआईआई और भारतीय रिटेल संगठनों ने मल्टीब्रांड में एफडीआई को कारोबार के लिए बेहतरीन पहल बताते हुए इसका समर्थन किया है।
हालांकि मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी के तहत 10 करोड़ डॉलर से कम विदेशी निवेश की इजाजत नहीं होगी। इसके अलावा मल्टीब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश का 50 फीसदी हिस्सा बैक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाना होगा। ईजीओएम की बैठक में मल्टीब्रैंड रिटेल स्टोर की कुल बिक्री का 30 फीसदी हिस्सा छोटे रिटेलर्स को बेचना का प्रस्ताव मंजूर हुआ है। इसके अलावा 10 लाख या उससे ज्यादा की जनसंख्या वाले शहरों में ही मल्टीब्रैंड रिटेल की छूट देने का प्रस्ताव है। हालांकि मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई के प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट कमिटी के पास भेजा जाएगा। इसके बाद संसद कें बहस होगी.
फिलहाल इस पर बहस जरी है. रिटेलर्स एसोसिएशन के मुताबिक मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई आने से सप्लाई चेन सुधरेगी और इससे महंगाई में कमी आएगी। इसके अलावा वेस्टेज भी कम होगा।वहीं फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी ने मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी पर खुशी जताई। किशोर बियानी के मुताबिक मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से देश के रिटेल कारोबार को काफी फायदा होगा। किशोर बियानी का मानना है कि मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से कई कंपनियां रिटेल सेक्टर में अपना कारोबार शुरू करने के लिए आगे आ सकती हैं। साथ ही मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से विदेशी कंपनियों को बड़ा बाजार मिलने की उम्मीद होगी।
 मल्टीब्रैंड  रिटेल में न्यूनतम 10 करोड़ डॉलर के एफडीआई को अनुमति दी है। इसके साथ ही एफडीआई वाले  मल्टीब्रैंड  स्टोर उन्हीं शहरों में खोले जा सकते हैं, जिनकी आबादी 2011 की जनगणना के आधार पर 10 लाख से अधिक है। 2001 की जनगणना के अनुसार इस दायरे में फरीदाबाद, वडोदरा, इंदौर, जबलपुर, अमृतसर, इलाहाबाद, वाराणसी, राजकोट समेत 35 शहर आते हैं। जबकि 2011 की जनगणना के आधार पर इन शहरों की संख्या और अधिक हो सकती है। हालांकि इस मामले पर पहले समिति में मतभेद थे लेकिन अब सभी राज्यों की राजधानियों में मल्टीब्रांड एफडीआई को अनुमति देने पर सहमति बनती नजर आ रही है। जबकि इससे पहले कुछ मंत्री इसे महज 6 महानगरों तक ही सीमित करने की सिफारिश कर रहे थे, जिससे इस पर आसानी से निगरानी रखी जा सके।
उद्योग जगत के जानकारों और आर्थिक सलाहकारों का मानना है कि  मल्टीब्रैंड  रिटेल क्षेत्र में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जहां एक ओर रिटेल क्षेत्र का आधुनिकीकरण होगा, वहीं महंगाई दर में भी कमी आएगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के महासचिव राजीव कुमार ने कहा, “”यह एक ब़डा फैसला है। हम चाहते हैं कि यह जल्द-से-जल्द शुरू हो।”"  कुमार ने कहा कि इनके प्रवेश से भारत के रिटेल क्षेत्र में नयापन आएगा। इसके साथ ही इससे महंगाई दर भी घटेगी, जो आज एक ब़डी समस्या बन गई है। एसोचैम के महासचिव डी.एस. रावत ने कहा कि इस कदम से न सिर्फ विदेशी निवेशकों, बल्कि भारतीय निवेशकों के बीच भी अच्छा संकेत जाएगा, जो यह मानकर चल रहे थे कि सरकार ब़डा फैसला नहीं ले सकती है। रावत ने कहा, “”सरकार ने पिछले कुछ समय से ब़डा फैसला नहीं लिया था। यदि सरकार इस सुझाव को मानती है, तो इसका हर क्षेत्र में बेहतर संकेत जाएगा।”" उन्होंने हालांकि कहा कि यह तो सिर्फ पहला कदम है। इसे अभी कई बाधाएं पार करनी है। सचिवों की समिति ने अपना सुझाव मंत्रिमंडलीय समिति को भेज दिया है। अब प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रीमंडलीय समिति इस पर विचार करेगी। सरकार के लिए इस पर फैसला लेना कठिन होगा, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य कई विपक्षी पार्टियां यह कहकर इस कदम का विरोध कर रही हैं कि बहुराष्ट्रीय रिटेल कम्पनियां छोटे-मोटे दुकानदारों तथा कारोबारियों को बाजार से खदे़ड देंगी।
डिलॉयटी के निदेशक गौरव गुप्ता ने कहा, “”सुपरबाजारों के काम करने का तरीका छोटे कारोबारियों से अलग होता है। मैं नहीं समझता कि ये सुपरबाजार छोटे कारोबारियों के लिए खतरा हैं।”" गुप्ता ने कहा कि समिति ने कम से कम 10 करो़ड डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा तय की है, इसलिए छोटे कारोबारियों को खतरा नहीं है। समिति ने सुझाव दिया है कि कुल निवेश का कम से कम आधा हिस्सा शीत भंडार जैसे आधारभूत संरचना में निवेश होना चाहिए। देश में अभी एकल ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी और कैश एंड कैरी थोक कारोबार में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत है। वालमार्ट जैसी अंतर्राष्ट्रीय रिटेल कम्पनियों ने पहले से यहां रणनीतिक साझेदारी के तहत कैश एंड कैरी कारोबार शुरू कर दिए हैं और जल्द-से-जल्द अपने सुपरबाजार भी शुरू करना चाहती हैं।
लेकिन देश के आम लोगों की राय है कि गली -मोहल्ले की मोहन सेठ ,धरमू काका ,खान चाचा की दुकान, ये सब सपना बन कर रह जायेगी. अमेरिका को देश को लूटने की खुली छूट दी जा रही है.किराने की दुकान चला ने वाले ,रेहडी वाले ,ट्रांसपोर्टर ,हम्माल ,कर्मचारी बेरोजगार हो जायेगे.किसानो को भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा. इस देश मैं अब कोई विपक्ष बचा नहीं है. इस अमेरिकी लूट के लिए हमारी सरकार ने लूटेरो को देश की चाबी दे दी हैं.
भारतीय खुदरा कारोबार का एक अनोखा ढांचा है। राशनिंग के साथ शुरू हुआ इसका सफर कपड़ा और फुटवियर रिटेल से होकर गुजरा है। 1990 के दशक के आखिर में इसने तेजी पकड़ी। मौजूदा दौर में भी भारत दुकानदारों का देश है जहां करीब 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी कारोबार इनके जरिये ही होता है। बहुरास्ट्रीय कंपनियों की लालची नजर इस पर हैं.देश एक बड़े संकट की और बड़ रहा है. आज़ादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी थी और अब अमेरिकी कम्पनियाँ हैं. हो सकता है कि कुछ सालों बाद आज़ादी की एक लडाई और लड़ना पड़े.

अमेरिका का दखल

अमेरिका का दखल
अमीन कुरेशी
अपने आप को पूरी दुनिया का दरोगा समझने  वाले अमेरिका का हमारे देश के मामलों में दखल अब इतना बड़ गया है कि वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. आर्थिक नीतियों, सामरिक और विदेश नीतियों में तो अमेरिका का दखल है ही अब  वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. भारत में होने वाले आंदोलनों को कैसे संभाला जाए इसकी नसीहत अमेरिका ने भारत को दी है. वास्तव में अमेरिका , भारत में होने वाले आंदोलनों को हवा दे कर अस्थिरता पैदा करना चाहता है. शांति उसे सूट नहीं करती है. अशांति होने पर उसको दखल देने का मौका मिलता है. फिर उस देश पर हमला करने का वह नैतिक अधिकार बताता है. हमले के बाद उस देश के सन साधनों पर कब्ज़ा कर कठपुतली सरकार बैठाता है. इस तरह वह कई देशों में घुसपैठ कर चुका है. अब उसके निशाने पर भारत है.
यह सही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में अमरीका की ओर से मिली नसीहत पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है लेकिन यह काफी नहीं है. अमेरिकी  विदेश मंत्रालय की नियमित ब्रीफ़िंग के दौरान प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में संयम बरतना चाहिए. विक्टोरिया न्यूलैंड से ये पूछा गया था कि भारत में आजकल नियमित प्रदर्शन हो रहे हैं और पुलिस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और भ्रष्ट राजनेताओं के ख़िलाफ़ लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचल रही है, क्या वे इससे चिंतित हैं?
इस सवाल के जवाब में अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड का कहना था- जैसा कि आप जानते हैं कि हम दुनियाभर में शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के अधिकार का समर्थन करते हैं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हम उम्मीद करते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में उचित संयम बरतेगा.
सवाल पूछने वाले ने 16 अगस्त से अन्ना हज़ारे के प्रस्तावित अनशन का भी ज़िक्र किया और कहा कि भारत के स्वतंत्रता दिवस के बाद का दिन प्रदर्शनों के हिसाब से बड़ा हो सकता है, क्योंकि इस दिन भारत में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक बड़ा प्रदर्शन होने वाला है.
लेकिन भारत ने अमरीकी विदेश मंत्रालय की टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में इसे ग़ैर ज़रूरी बताया गया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है- हम अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता का ग़ैर ज़रूरी बयान देखा है, जो उन्होंने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने पर दिया है. भारतीय संविधान में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का उल्लेख है, जिसका इस्तेमाल भारत के 1.2 अरब नागरिक करते हैं. जून में काले धन को लेकर बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे और दिल्ली पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करके अनशन बंद करा दिया था. दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की काफ़ी आलोचना हुई थी.
सवाल यह उठता है कि  विक्टोरिया न्यूलैंड के सामने यह सवाल क्यों उठाया गया. क्या इस तरह के सवाल उठाने वाले पत्रकार अमेरिका के इशारे पर ही इस तरह के सवाल करते हैं. यदि सवाल पूछ भी था तो  विक्टोरिया न्यूलैंड को जवाब देना था कि यह भारत का आन्तरिक मामला है. सच तो यह है कि अमेरिका को हमने  सर चढ़ा रखा है. अब भी समय है संभलने का. कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो जाए.