अमीन क़ुरेशी
-समर्थन के सूत्र -
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-किसानों को फसलों का सही मूल्य
-बिचौलियों का सफाया होगा
-उपभोक्ताओं को लाभ होगा
-भंडारण की सुविधाओं का विकास
-नई टेक्नोलॉजी आएगी
-लाखों लोगो को मिलेगा रोजगार
-सिर्फ बडे शहरो में मंजूरी
-राज्य सरकारें निर्णय के लिए स्वतंत्र
-बिगबाजार और रिलायंस भी तो है
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-विरोध के सुर-
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-खुदरा कारोबारियों पर संकट
-बेरोजगारी बढेगी
-बाजार पर कब्जा
-मनमाने दाम
सरकार ने 24 नवंबर को एक बड़ा फैसला लेते हुये मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में 51 प्रतिशत फोरेन डाईरेक्ट इंवेस्मेट (एफडीआई) की अनुमति दे दी. इसके साथ ही एक अन्य फैसले में एकल ब्रांड रिटेल क्षेत्र में 51 प्रतिशत की सीमा को समाप्त कर शतप्रतिशत निवेश का फैसला किया. इसके बाद से हीं संसद से सड़क तक इस पर बहस जारी है. सरकार इसके फायदे गिना रही है और विरोधी दल नुकसान से आगह कर रहे है लेकिन रिटेल सेक्टर में एफडीआई से फायदे अधिक और नुकसान कम दिखायी दें रहे है.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि एफडीआई से देश को फायदा ही फायदा होगा. एफडीआई से देश में नई टेक्नोलॉजी आएगी, जिससे देश को फायदा होगा. किसानों को अपने फसलों का सही मूल्य मिलेगा और भंडारण की सुविधाओं का भी विकास होगा, जिससे किसानों को फायदा होगा. उपभोक्ताओं को लाभ होगा. लाखों की संख्या में रोजगार उत्पन्न होंगे.
सरकार के अनुसार घरेलू खुदरा कारोबारियों को इससे लाभ होगा. वह अपनी जरुरत का माल थोक में कैश एण्ड कैरी स्टोरों से रियायती दाम पर खरीद सकेंगे. चीन, थाइलैंड, ब्राजील और सिंगापुर जैसे देशों में जहां खुदरा कारोबार में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है और कोई सीमा तय नहीं की गई है वहां भी खुदरा स्टोर फल फूल रहे हैं.रिटेल में एफडीआई के बारे में यह भी गलत धारणा बनी है कि इससे रोजगार समाप्त होगा जबकि सच्चाई यह है कि एक करोड़ से भी अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे. एफडीआई से सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि भारत दुनिया का शॉपिंग हब बन सकता है.
केन्द्र के इस फैसले के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी सहित विपक्ष और सरकार की बड़ी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस में है. इसके अलावा कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इसका विरोध किया है. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि वह वालमार्ट और केरेफोर जैसी विदेशी रिटेल चैन को राज्य में स्टोर खोलने के लिये लाइसेंस नहीं देगी. इन सब का कहना है कि एफडीआई घरेलू खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है. कुल मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा. वैश्विक रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते ही ज्यादा से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी हासिल करना होगा. जब एक बार वे बाजार पर काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी. हमारे बिचौलिये न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद है.वर्ष 2005 से देश में बड़े कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में शामिल हो गए हैं.अब जरा तुलना करें. उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर उनसे भी ज्यादा हैं.
यूपीए सरकार के रीटेल में एफडीआई वाले फैसले का विरोध कर रही बीजेपी 2004 में खुद इसके पक्ष में थी. 2004 के लोकसभा चुनाव मेंबीजेपी का घोषणा पत्र कहता है, ‘ व्यापार और रोजगार की वृद्धि के लिए उचित कानूनी और आर्थिक तरीकों के जरिए संगठित रीटेल ट्रेड को इंटरनैशनल पैटर्न पर बढ़ावा दिया जाएगा.रीटेल में 26 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी जाएगी. भारतीय उत्पादों के लिए विदेशी रीटेल चेन को प्रोत्साहित किया जाएगा. ’ हालांकि अब बीजेपी छोटे और खुदरा व्यापारियों के हित की बात करते हुए रीटेल में एफडीआई का विरोध कर रही है. 2004 में जब यह घोषणा पत्र जारी किया गया था उसी वक्त एनडीए सरकार ने रिसर्च एजेंसी आईसीआरआईईआर की रिपोर्ट मानी थी जो विदेशी रीटेलर्स को अनुमति देने के फायदों और नुकसान पर आधारित थी. हालांकि जब तक यह रिपोर्ट दी जाती तब तक एनडीए सरकार की जगह यूपीए सत्ता में आ चुकी थी. यूपीए ने अपने पहले शासन काल के दौरान लेफ्ट पार्टियों के दबाव की वजह से केवल सिंगल ब्रैंड रीटेल की अनुमति दी थी. 2009 में बीजेपी ने अपना रुख बदल लिया था। 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए जारी घोषणा पत्र में कहा गया था कि रीटेल में एफडीआई को अनुमति नहीं दी जाएगी. बीजेपी की नजर अब वोट बँक पर है. खुदरा कारोबारी बीजेपी का पक्का वोट बँक है.
भारतीय खुदरा कारोबार का एक अनोखा ढांचा है. राशनिंग के साथ शुरू हुआ इसका सफर कपड़ा और फुटवियर रिटेल से होकर गुजरा है. 1990 के दशक के आखिर में इसने तेजी पकड़ी। मौजूदा दौर में भी भारत दुकानदारों का देश है जहां करीब 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है. भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी इनके जरिये ही होता है.
पिछले दशक में डिपार्टमेंटल स्टोर से लेकर हाइपर मार्केट और यहां तक कि स्पेशियलिटी स्टोर भारत में खुले हैं. बड़े शहरों और मेट्रो में शॉपिंग मॉल खरीदारी के लिए मध्य वर्ग की पहली पसंद के तौर पर उभर रहे हैं। कहा जा रहा है कि इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा और उनकी आजीविका संकट में पड़ जाएगी.बिग बाजार, डी मार्ट और रिलायंस जैसे देशी डिपार्टमेंटल स्टोर और हाइपर मार्केट के खुलने से खुदरा कारोबार समाप्त नही हुवा है. देशी डिपार्टमेंटल स्टोर और हाइपर मार्केट से भी लाखो लोगो को रोजगार मिला है.मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में 51 प्रतिशत फोरेन डाईरेक्ट इंवेस्मेट की अनुमति से यदि किसानों को फसलों का सही मूल्य मिलता है तो कम से कम देश की ७० % ग्रामीण जनता का भला हो सकता है.
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