Tuesday, 29 November 2011

FDI: नुकसान कम,फायदे ज्यादा


अमीन क़ुरेशी


-समर्थन के सूत्र -
-----------------

-किसानों को फसलों का सही मूल्य
-बिचौलियों का सफाया होगा
-उपभोक्ताओं को लाभ होगा
-भंडारण की सुविधाओं का विकास
-नई टेक्नोलॉजी आएगी
-लाखों लोगो को मिलेगा रोजगार
-सिर्फ बडे शहरो में मंजूरी
-राज्य सरकारें निर्णय के लिए स्वतंत्र
-बिगबाजार और रिलायंस भी तो है

------------------------

-विरोध के सुर-
---------------

-खुदरा कारोबारियों पर संकट
-बेरोजगारी बढेगी
-बाजार पर कब्जा
-मनमाने दाम



सरकार ने 24 नवंबर को एक बड़ा फैसला लेते हुये मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में 51 प्रतिशत फोरेन डाईरेक्ट इंवेस्मेट (एफडीआई) की अनुमति दे दी. इसके साथ ही एक अन्य फैसले में एकल ब्रांड रिटेल क्षेत्र में 51 प्रतिशत की सीमा को समाप्त कर शतप्रतिशत निवेश का फैसला किया. इसके बाद से हीं संसद से सड़क तक इस पर बहस जारी है. सरकार इसके फायदे गिना रही है और विरोधी दल नुकसान से आगह कर रहे है लेकिन रिटेल सेक्टर में एफडीआई से फायदे अधिक और नुकसान कम दिखायी दें रहे है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि एफडीआई से देश को फायदा ही फायदा होगा. एफडीआई से देश में नई टेक्नोलॉजी आएगी, जिससे देश को फायदा होगा. किसानों को अपने फसलों का सही मूल्य मिलेगा और भंडारण की सुविधाओं का भी विकास होगा, जिससे किसानों को फायदा होगा. उपभोक्ताओं को लाभ होगा. लाखों की संख्या में रोजगार उत्पन्न होंगे.

सरकार के अनुसार घरेलू खुदरा कारोबारियों को इससे लाभ होगा. वह अपनी जरुरत का माल थोक में कैश एण्ड कैरी स्टोरों से रियायती दाम पर खरीद सकेंगे. चीन, थाइलैंड, ब्राजील और सिंगापुर जैसे देशों में जहां खुदरा कारोबार में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है और कोई सीमा तय नहीं की गई है वहां भी खुदरा स्टोर फल फूल रहे हैं.रिटेल में एफडीआई के बारे में यह भी गलत धारणा बनी है कि इससे रोजगार समाप्त होगा जबकि सच्चाई यह है कि एक करोड़ से भी अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे. एफडीआई से सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि भारत दुनिया का शॉपिंग हब बन सकता है.

केन्द्र के इस फैसले के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी सहित विपक्ष और सरकार की बड़ी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस में है. इसके अलावा कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इसका विरोध किया है. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि वह वालमार्ट और केरेफोर जैसी विदेशी रिटेल चैन को राज्य में स्टोर खोलने के लिये लाइसेंस नहीं देगी. इन सब का कहना है कि  एफडीआई  घरेलू खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के कड़े शिकंजे में लेने का ही एक जरिया है. कुल मिलाकर यह देसी खुदरा कारोबारियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा. वैश्विक रिटेलरों का मकसद बाजार में उतरते ही ज्यादा से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी हासिल करना होगा.  जब एक बार वे बाजार पर काबिज हो जाएंगी तो फिर मनमाने तरीके से बाजार को चलाएंगी और लोगों से उलूल-जुलूल दाम वसूलेंगी. हमारे बिचौलिये न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं बल्कि देश के सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वह एकदम बेबुनियाद है.वर्ष 2005 से देश में बड़े कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में शामिल हो गए हैं.अब जरा तुलना करें. उनके यहां उत्पादों के भाव या तो बाजार में चल रहे भावों के बराबर ही हैं या फिर उनसे भी ज्यादा हैं.

यूपीए सरकार के रीटेल में एफडीआई वाले फैसले का विरोध कर रही बीजेपी 2004 में खुद इसके पक्ष में थी. 2004 के लोकसभा चुनाव मेंबीजेपी का घोषणा पत्र कहता है, ‘ व्यापार और रोजगार की वृद्धि के लिए उचित कानूनी और आर्थिक तरीकों के जरिए संगठित रीटेल ट्रेड को इंटरनैशनल पैटर्न पर बढ़ावा दिया जाएगा.रीटेल में 26 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी जाएगी. भारतीय उत्पादों के लिए विदेशी रीटेल चेन को प्रोत्साहित किया जाएगा. ’ हालांकि अब बीजेपी छोटे और खुदरा व्यापारियों के हित की बात करते हुए रीटेल में एफडीआई का विरोध कर रही है. 2004 में जब यह घोषणा पत्र जारी किया गया था उसी वक्त एनडीए सरकार ने रिसर्च एजेंसी आईसीआरआईईआर की रिपोर्ट मानी थी जो विदेशी रीटेलर्स को अनुमति देने के फायदों और नुकसान पर आधारित थी. हालांकि जब तक यह रिपोर्ट दी जाती तब तक एनडीए सरकार की जगह यूपीए सत्ता में आ चुकी थी. यूपीए ने अपने पहले शासन काल के दौरान लेफ्ट पार्टियों के दबाव की वजह से केवल सिंगल ब्रैंड रीटेल की अनुमति दी थी. 2009 में बीजेपी ने अपना रुख बदल लिया था। 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए जारी घोषणा पत्र में कहा गया था कि रीटेल में एफडीआई को अनुमति नहीं दी जाएगी. बीजेपी की नजर अब वोट बँक पर है. खुदरा कारोबारी बीजेपी का पक्का वोट बँक है.

भारतीय खुदरा कारोबार का एक अनोखा ढांचा है. राशनिंग के साथ शुरू हुआ इसका सफर कपड़ा और फुटवियर रिटेल से होकर गुजरा है. 1990 के दशक के आखिर में इसने तेजी पकड़ी। मौजूदा दौर में भी भारत दुकानदारों का देश है जहां करीब 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है. भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी इनके जरिये ही होता है.

पिछले दशक में डिपार्टमेंटल स्टोर से लेकर हाइपर मार्केट और यहां तक कि स्पेशियलिटी स्टोर भारत में खुले हैं. बड़े शहरों और मेट्रो में शॉपिंग मॉल खरीदारी के लिए मध्य  वर्ग की पहली पसंद के तौर पर उभर रहे हैं। कहा जा रहा है कि इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान होगा और उनकी आजीविका संकट में पड़ जाएगी.बिग बाजार, डी मार्ट और रिलायंस जैसे देशी डिपार्टमेंटल स्टोर और  हाइपर मार्केट के खुलने से  खुदरा कारोबार समाप्त नही हुवा है. देशी डिपार्टमेंटल स्टोर और  हाइपर मार्केट से भी लाखो लोगो को रोजगार मिला है.मल्टी ब्रांड रिटेल कारोबार में 51 प्रतिशत फोरेन डाईरेक्ट इंवेस्मेट की अनुमति से यदि किसानों को फसलों का सही मूल्य मिलता है तो कम से कम देश की ७० % ग्रामीण जनता का भला हो सकता है.
--------------

Saturday, 19 November 2011

औद्योगिक और कृषि उत्पाद के दाम

औद्योगिक और कृषि उत्पाद के दाम

-------------------------------------

अमीन कुरेशी

------------------

-उद्योगपति मालामाल, किसान कंगाल

-औद्योगिक उत्पाद की तरह नहीं बढ़ते कृषि उत्पाद के दाम

-अनाज के समर्थन मूल्य में होती है मामूली वृद्धि

 पुराने लोग बताते हैं कि साठ-सत्तर के दशक में ढाई क्विंटल गेंहू में एक तोला सोना मिल जाता था. आज ढाई क्विंटल गेंहू में एक ग्राम सोना ही मिलता है . आज सोने का दाम लगभग ३० हज़ार रूपए तोला है तो इस हिसाब से गेंहू का दाम १२ हज़ार रूपए क्विंटल होना चाहिए लेकिन इस वर्ष यह दाम १२८५ रूपए है. साठ-सत्तर के दशक में ही एक क्विंटल गेंहू में 121 लीटर डीजल मिलता था लेकिन आज सिर्फ 24 लीटर ही मिलता है. कहने का तात्पर्य यह है कि जिस रफ़्तार से बाकी सब वस्तुओं के दाम बढे हैं उसी रफ़्तार से कृषि उत्पाद या अनाज के दाम नहीं बढे हैं. कृषि उत्पाद और औद्योगिक उत्पाद के दामों में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है.  कृषि उत्पाद के दाम सरकार द्वारा समर्थन मूल्य से तय किये जाते हैं जबकि औद्योगिक उत्पाद के दाम उद्योगपति स्वयं तय करता है. वह तय करता है कि उसकी एंटीबायोटिक की एक टैबलेट ५० रूपए की आयेगी.  १० ग्राम की चोकलेट २० रूपए की आयेगी. एक लीटर पानी १५ रूपए का आयेगा. यही नहीं जो आलू औए टमाटर औने-पौने दामों में किसान से ख़रीदे जाते हैं उनसे बनी वैफर और सोस किस दाम पर मिलते हैं यह सभी जानते हैं. किसान के  दो रूपए किलो के आलू को २०० रूपए में बेचने के इस अर्थशास्त्र में एक तरफ किसान के श्रम की न्यूनतम कीमत है तो दूसरी तरफ पूंजी से पूंजीपति होने का रास्ता है.

कहने का तात्पर्य यह है कि एक तरफ किसान कंगाल और दूसरी तरफ उद्योगपति  मालामाल हो रहा है. क्या आपने कभी सुना है कि किसी  उधोगपति ने आत्म हत्या कर ली है. जबकि देश के १००-२०० किसान प्रत्येक वर्ष क़र्ज़ और गरीबी से तंग आकर काल के गाल समा जाते है. बीते 15 वर्षों में ढ़ाई लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. कृषि के अलाभकारी होने का क्या इससे बड़ा सबूत और क्या होगा ?

प्रत्येक पीढ़ी में उसकी ज़मीन का बंटवारा होते होते कृषि का रगबा बीघा दो बीघा पर आजाता है. इस बची खुची जमीन को भी वह कलकारखाने लगाने वाले उद्योगपति को बैच कर शहर चला आता है और यहाँ किसी गन्दी बस्ती में मरखप जाता है या उसी फक्ट्री में मजदूरी करने पर मजबूर हो जाता है.

आज ज़रूरत है किसान को कृषि उपज के भरपूर दाम देने की. किसानों की उपज का दाम सरकार बढाती है लेकिन वह ऊंट के मूह में जीरे के बराबर है. सरकार ने कृषि के दाम तय करने के लिए ' कृषि लागत व मूल्य आयोग' बनाया है लेकिन सरकार इसकी सिफारिशों को पूरी तरह मानती नहीं है. आयोग  ने वर्ष 2012-13 के लिए गेंहू के न्यूनतम समर्थन मूल्य में रुपए 230 वृध्दि का प्रस्ताव किया था लेकिन खाद्य व वित्त मंत्रालयों ने इस पर यह कहते हुए आपत्ति जताई थी कि इससे महंगाई और बढ़ जाएगी.  केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस वर्ष गेंहू के मूल्य में रुपए 115 प्रति क्विंटल वृध्दि की राय दी थी और वही मानी भी गई. गत वर्ष तो गेंहू के दामों में सिर्फ बीस रुपए प्रति क्विंटल की ही वृध्दि की गई थी. इस पर जब किसानों ने सरकारी  केंद्रों के बजाय  व्यापारियों  को गेंहू बेचना शुरु कर दिया तो  सरकार ने 50 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस भी स्वीकार किया. तब कहीं जाकर सरकारी गेंहू 1170 रुपए प्रति क्विंटल हो पाया था. कृषि संसाधनों व दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दाम आसमान छूने के बावजूद सरकार के मन में उनके प्रति कोई झुकाव नहीं है. सरकार विदेशों से सड़ा हुआ गेंहू २५०० रुपया प्रति क्विंटल खरीद सकती है, लेकिन अपने किसानों को वह 1500 रुपया क्विंटल भी देने को तैयार नहीं!

समर्थन मूल्य से गेंहू का दाम 11 पैसा प्रति किलो महंगा हो जाएगा. देश में क्या और कोई ऐसी वस्तु है जिसके दाम में महज १०-१५ पैसे प्रति किलो की वृध्दि होती हो? अनाज की मूल्य वृध्दि करते समय सरकार उसे पैदा करने वाले किसान की नहीं बल्कि उसे खरीदने वाले मध्यम वर्ग का ख्याल रखती है?  कृषि लागत व मूल्य आयोग  उपज का मूल्य निर्धारण करते समय क्या वह इसके समानान्तर अन्य क्षेत्रों के आय में हो रही वृध्दि और बाजार का ख्याल नहीं रखता?  डीजल व ऑयल, रासायनिक उर्वरक, बीज व कीटनाशक आदि के दामों में काफी वृध्दि हो चुकी है तथा बाजार में दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम कहां से कहां पहुंच गए हैं. क्या इसी के समतुल्य कृषि उपज का दाम नहीं बढ़ना चाहिए? सरकार अपने कर्मचारियों को जिस मानक से वेतन व महंगाई भत्ते की वृध्दि देती है, क्या उसी के अनुरूप किसानों को उनकी उपज का दाम नहीं मिलना चाहिए? देश में जिस तरह सीमांत किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है उससे या तो किसान सिर्फ खाने भर को ही अनाज पैदा करेंगें और बाकी का सरकार को विदेशों से दोगुनी कीमत पर आयात करना होगा. विदेशी किसानों को मालामाल करने से बेहतर है कि एक निश्चित कालखंड को मानक मान कर जिस अनुपात में आवश्यक वस्तुओं के बाजार भाव बढ़ें, देशी  किसानों के उत्पाद के भी दाम उसी अनुरूप तय कर किसान, कृषि, गाँव और इस कृषि प्रधान देश को बचाना चाहिए. आखिर विश्व आर्थिक संकट के समय इसी रीड की हड्डी के कारण भारत मजबूती से खड़ा रहता है.

---------------

  

Friday, 11 November 2011

ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा


ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा
अमीन कुरेशी 
हमारे देश में तेज़ी से मालामाल होने के धंधे में राजनीति का स्थान अब तक प्रथम रहा है और आगे भी रहेगा लेकिन भ्रष्ट नेताओं की गिरफ्तारी ने अन्य नेताओं को सोचने पर ज़रूर मजबूर कर दिया है कि वे जनता के पैसों को लूट कर जिंदगी भर मज़ा नही कर सकते. एक न एक दिन उन्हें भी जेल  की हवा खानी पड़ सकती है. 

भ्रष्टाचार के खिलाफ हर तरफ जारी मुहिम के बीच भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी नेताओं को चेताया है कि अगर उन्हें पैसा कमाना है तो वह व्यवसाय करें, बिजनेस करें और उसके जरिए खुद भी कमाएं और दूसरों को भी रोजगार दें मगर राजनीति को पैसा कमाने का जरिया न बनाएं. गडकरी ने साफ किया कि जो भी कार्यकर्ता विधायक या सांसद बनकर पैसा कमाने की कोशिश करेगा उसके लिए भाजपा में कोई जगह नहीं है.

यह अलग बात है कि येदियुरप्पा और अन्य भाजपा नेता भी भ्रष्टाचार में पकड़े गए है, कमसेकम बड़े नेता यह कहने पर बाध्य हुए हैं कि राजनीति  पैसा कमाने का जरिया नहीं है.

नेता ही नही नवजात नेते भी यह देख सकते हैं कि दिल्ली की  तिहाड़ जेल जो हमेशा से खतरनाक मुजरिमों का ठिकाना बनता रहा है वहां अब सियासी नेताओं और हाई प्रोफाइल लोगों की  पनाहगाह बन गई है . यहां आजकल दो दर्जन से अधिक हाईप्रोफाइल कैदी डेरा डाले हुए हैं. खास बात यह है कि 18 वीआइपी कैदी तो हाल ही में 2जी स्पेक्ट्रम व सीडब्लूजी घोटाले के आरोपी के रूप में आए हैं. हाल में आए 18 वीवीआइपी कैदियों में से 13 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोपी हैं.इसमें पूर्व केंद्रीय सूचना मंत्री ए राजा भी शामिल हैं. राजा तिहाड़ की जेल संख्या एक में बंद हैं. उनके साथ इस घोटाले से जुड़े कई कॉरपोरेट अधिकारी व व्यवसायी जो घोटाले में आरोपी हैं, जेल संख्या-एक में हैं. इनमें पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बरुआ के अलावा आरके चंदोलिया, शाहिद बलवा, आसिफ बलवा, राजीव अग्रवाल, सुरेंद्र पिपारा व गौतम दोषी जेल संख्या एक में बंद हैं. इसके अलावा 2जी मामले में ही अन्य आरोपी हरि नायर, संजय चंद्रा व विनोद गोयनका तीन नंबर जेल में बंद हैं. घोटाले से जुड़े दो अन्य आरोपी कनीमोरी व शरद कुमार तिहाड़ में हैं . वहीं सीडब्ल्यूजी घोटाले के आरोपी सुरेश कलमाड़ी, सुरजीत लाल, एबी प्रसाद, पूर्व सीडब्ल्यूजी सचिव ललित भनोट व पूर्व महानिदेशक वीके वर्मा चार नंबर जेल में बंद हैं.इनके अलावा कई और भी हाईप्रोफाइल कैदी जेल में बंद हैं। उन कैदियों में मनु शर्मा, विकास यादव, आरके शर्मा, माधुरी गुप्ता, शारदा जैन व हाल ही में कबूतरबाजी के आरोप में तिहाड़ पहुंचे क्रिकेटर जैकब मार्टिन शामिल हैं.

इन लोगों को देख कर एक सवाल उठता है कि आखिर भ्रष्ट मार्गों से जमा धन से इनकी क्या गत हुई है. एक समय था जब कलमाडी की कांग्रेस और पुणे में तूती बोलती थी. अमर सिंह किंग मेकर हुवा करते थे. राजा ने बहुत कम आयु में अपना राज कायम कर लिया था. बलवा का जलवा था. बुरे कामों का बुरा अंजाम आज सबके सामने है. इसीलिये गीता में कहा गया है ' कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'.   इस पंक्ति का अर्थ हम यही जानते हैं की कर्म करने में ही हमारा अधिकार हो, फल में कभी नहीं . भाव यह बनता है कि यदि हम अच्छा कर्म करें तो अच्छा फल मिलेगा. और यदि बुरा कर्म करें तो बुरा फल मिलेगा . यदि हम इस अर्थ को सही मान लें तो इसका अर्थ है कि हमें अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्म करने का अधिकार है . अर्थात अच्छे कर्म करो और फल की इच्छा न करो और बुरा कर्म करो और फल की इच्छा न करो . पहला अर्थ तो उचित है परन्तु दूसरा अर्थ तो यह हुआ कि अपराध करो और जेल रूपी फल की इच्छा न करो. वास्तव में कर्म शब्द का अर्थ है - 'शुभ कर्म . कर्मण्ये वा अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का अर्थ है - हमारा शुभ (अच्छे ) कर्म करने में ही अधिकार है, और शुभ कर्म के फल की इच्छा भी नहीं करनी चाहिए (क्योकि कर्म फल तो निश्चित ही है ) अर्थात  ईश्वर  ने हमें केवल शुभ कर्म करने का ही अधिकार दिया है, अशुभ कर्म करने का नहीं.

जीवन की अवधि बहुत कम होती है और इसलिए कहाजाता है जितने हो सकें अच्छे कर्म इस जिंदगी में करना चाहिए क्योंकि यह  ' ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा'. 
 

Monday, 10 October 2011

मेहनती मजदूरों की कमी

अमीन कुरेशी
------------------
मेहनती मजदूरों की कमी
--------------------------
-मनरेगा से सोयाबीन की कटाई पर असर
-मनरेगा में शामिल हो खेती के काम
------------------

भारत के ७० प्रतिशत लोग गाँव में बसते हैं. गाँव के ये लोग काफी मेहनतकश माने जाते हैं लेकिन अब विभिन्न कारणों से ग्रामीण मजदूर औए किसान भी सुस्त होते जा रहे हैं. इसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ रहा है. इसके दो प्रमुख कारण सामने आये हैं. एक तो मनरेगा और दूसरा कारण शहरी निवेशक .

महात्मा गांधी नेशनल रुरल एम्प्लोयमेंट गारंटी एक्ट  (मनरेगा)  ने ग्रामीण मजदूरों को सुस्त बना दिया है. मनरेगा में मिलनेवाली १२० रूपए मजदूरी और काम नाम मात्र. लंच से पहले और लंच  के बाद थोडा बहुत काम कर दिन पूरा हो जाता है. यही कारण है कि ये मजदूर अब खेती बड़ी के काम में किसानों के यहाँ मजदूरी नहीं करते है. इस समय मालवा में सोयाबीन की कटाई का सीज़न है. सोयबीन को पकने के बाद फ़ौरन काटना होता है अन्यथा उसकी फली तिड़ जाती है और दाना खेत में गिर जाता है. ऐसे में मजदूरों की डिमांड सबसे अधिक होती है. किसान १५० से २०० रु तक मजदूरी देने को तैयार होते हैं लेकिन मनरेगा में लगे और बिगड़े मजदूर फसल काटने को तैयार नहीं हैं. इसका असर आम  किसानों पर हो रहा है. बड़े  किसान अब पंजाब से हार्वेस्टर किराये पर लाने लगे हैं. इसलिए उनके खेतों की फसल फटाफट कट जाती है लेकिन आम किसान परेशान हो रहा है. हार्वेस्टर से कटी फसल में सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि भूसा पूरे खेत में बिखर जाता है और किसी काम का नहीं रहता है. इससे पशु आहार की कमी होती है.

खेती बाड़ी  में हो रही मजदूरों की कमी पर हालही में उद्योग संगठन फिक्की ने भी आवाज़ उठाई है. फिक्की ने मनरेगा के उद्योग और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का सर्वेक्षण किया है। इस सर्वे में सुझाव दिया गया है कि जब खेती-बाड़ी का काम जोरों पर हो तो इसे बंद कर देना चाहिए। सरकार की प्रमुख ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा के कारण उद्योगों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इससे मजदूरी बढ़ रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
फिक्की ने कहा कि इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों में किए जाने वाले काम को भी मनरेगा के तहत शामिल किया जाना चाहिए। ये उन क्षेत्रों में विशेष तौर पर लाभकारी होगा जहां औद्योगिक गतिविधियां ज्यादा है।सर्वेक्षण में पाया गया है कि मजदूरी 10 फीसद से ज्यादा बढ़ी है। मजदूरी की कमी के कारण संभावित नुकसान भी 10 फीसद आंका गया है ।
इससे पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह सुझाते हुए पत्र लिखा है कि जब खेती का काम जोरों पर हो तो मनरेगा की योजना निलंबित कर देनी चाहिए। हालांकि ग्रामीण विकास मंत्रालय इन प्रस्तावों से इत्तफाक नहीं रखता।
केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने मनरेगा को कृषि से जोड़ने की बात कही थी लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है.
दूसरी तरफ बड़ी संख्या में शहरी निवेशक ग्रामीण इलाकों में ज़मीन खरीद रहे हैं. मुंह मांगी कीमत, धन के लालच, मजदूरों से परेशान, आपदा , बैंकों का क़र्ज़ अदि परेशानियों से तंग आ कर कई किसान इनके चंगुल में फंस कर भूमिहीन हो रहे हैं. कई शहरी निवेशक खरीदी गई ज़मीन को एन ए कराने के लिए पड़त रखते हैं . इससे अनाज के उत्पादन में कमी आ रही है.

शहरी निवेशकों द्वारा  खरीदी गई ज़मीन, सेज़ के लिए भूमि अधिग्रहण, नुक्लियर पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण, महामार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण, नयी कालोनियों के लिए भूमि अधिग्रहण, मोबाईल टावरों के लिए भूमि अधिग्रहण और उद्दोग के लिए भूमि अधिग्रहण इत्यादि कारणों से देश में कृषि योग्य भूमि का रगबा लगातार कम होता जा रहा है और अनाज की मांग बढती जा रही है. माना जा रहा है कि 2051 तक कृषि योग्य भूमि का रगबा १५ प्रतिशत काम हो जायेगा और अनाज की मांग डबल हो जायेगी.

अब समय आगया है कि सरकार कृषि काम में मनरेगा को शामिल किया जाए. देहातों में मची ज़मीन की लूट को रोकी  जाए. नयी योजनायें बंज़र भूमि पर कायम की जाएँ.

भारत और चीन के बीच बढ़ी सुपर पावर की दौड़

अमीन कुरेशी
------------------------------
भारत और चीन  के बीच बढ़ी  सुपर पावर की दौड़
-----------------------------------
-अमेरिका में आर्थिक मंदी और आन्दोलन.
-अमेरिका में पूंजीवादी नीतियां हुईं नाकाम.
-भारत को पूंजीवाद पर  विचार करने की ज़रुरत.
-अमेरिका में आर्थिक विकास की दर 2.3 प्रतिशत.
-भरत कि आर्थिक विकास दर ८-९ फीसदी.
-चीन की विकास दर १०  फीसदी.
-डॉलर से अधिक चीनी मुद्रा रेनमिनबी की मांग.
-------------------------------
अमेरिका में दो साल पहले शुरू हुई मंदी वहां के बड़े बैंकों की गलत नीतियों का अंजाम थी. अमरीका में जनता आर्थिक संकट और बेरोज़गारी में वृद्धि का ज़िम्मेदार, अमरीकी बैंकरों को मानती  है. अमेरिकी समाज में लोगों की आमदनियों में बढ़ते फासले और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. पूंजीवाद के नये पैंतरे के रूप में भूमंडलीकरण को आये हुये महज दो ही दशक हुये हैं कि ये स्थिति आ गयी. कभी न कभी पूंजीवाद के खिलाफ लोग लामबंद होंगे, यह तय था, लेकिन इतनी जल्दी होंगे, यह पता नहीं था. तो  क्या अब अमेरिकी पूंजीवादी नीतियां उसके लिए अब खतरनाक साबित हो रही हैं? क्या अमेरिका इस संकट से आसानी से निकल पाएगा? या अब भारत और चीन एक  नयी विश्व शक्ति के रूप में उभरेंगे.
हाल के घटनाक्रमों के मद्देनज़र अब विश्व स्तर पर यह माना जा रहा है कि अमेरिका का राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव अगले दो वर्षों में काफी कम हो जाएगा और वर्ष 2025 तक वह एकमात्र सुपरपॉवर का दर्जा खो देगा. ब्रिटेन के शीर्ष खुफिया संगठन ने अपनी रिपोर्ट में इस बात के संकेत देते हुए कहा है कि इस दौरान चीन और भारत अमेरिका  को प्रभुत्व के मामले में कड़ी प्रतिस्पर्धा देते हुए उसके साथ शीर्ष पर आ जाएँगे. राष्ट्रीय खुफिया परिषद ने अपनी इस रिपोर्ट में वर्ष 2025 को लक्ष्य बनाकर दुनियाभर में शक्ति संतुलन के रुझान का विश्लेषण किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान परमाणु हथियारों का उपयोग काफी बढ़ने की संभावना है.
अपना पद छोड़ते समय अमेरिका के रक्षा मंत्री रॉबर्ट्स गेट्स ने यह आशंका व्यक्त करते हुए कहा था कि देश में चल रहे जबर्दस्त आर्थिक संकट के मद्देनजर, अमेरिका को विश्व के दूसरे देशों को लेकर अपनी नीतियों में फेरबदल करना पड़ा है. उन्होंने कहा कि उनके पद छोड़ने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि वे ऐसी किसी सरकार का हिस्सा नहीं बने रहना चाहते, जो कमजोर हो।गेट्स ने कहा कि उन्होंने अधिकांश समय अमेरिकी सरकार के साथ काम करते हुए निकाला है और अमेरिका को सुपर पॉवर बनाए रखने के लिए काफी मेहनत भी की है. लेकिन अब समय बदल रहा है. उन्होंने साफ कहा कि यह उनके पद छोड़ने का प्रमुख कारण है.
 अमेरिका के वाणिज्य मंत्रालय ने बिगड़ती अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सीधे विदेशी निवेश पर जोर दिया है.अमेरिका के शीर्ष उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपने देश में भारत, चीन और ब्राजील से और निवेश का आह्वान किया ताकि अमेरिका में रोजगार के और अवसर पैदा किए जा सकें। जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी के अध्यक्ष और मुख्य कार्याधिकारी जेफ्री इमेल्ट ने कहा कि चीन, भारत, ब्राजील जैसी जगहों, जहां अभी लोगों के पास पैसा है, से हमारे यहां सीधा निवेश नाममात्र को है और कोई वजह नहीं है कि ये देश अमेरिका में उससे ज्यादा निवेश नहीं कर सकते जितना कि वे अभी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि मुझे पूरा भरोसा है कि यदि हमारे यहां भारत, चीन और अन्य जगहों से ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होता है तो हमारे यहां उतनी समस्या नहीं होगी जितनी अभी है.
 भरत कि आर्थिक विकास दर ८-९ फीसदी है. चीन की विकास दर भी पिछले तीन दशकों से लगातार 10 फीसदी से ज्यादा है. अर्थशास्त्रियों के लिए ये किसी पहेली से कम नहीं है. अमेरिकी करेंसी डॉलर के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है और विशेषज्ञों का मानना है कि रिजर्व करेंसी के रूप में इसके दिन पूरे हो गए हैं. अब चीन की मुद्रा रेनमिनबी (आरएनबी) का ज़माना आ रहा है.चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत होने का असर उसकी करेंसी पर साफ दिख रहा है. इसकी मांग और ताकत दोनों ही बढ़ी है. इसका विश्व अर्थव्यवस्था में रोल बढ़ता ही जा रहा है और संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह डॉलर की जगह ले लेगी. 

एक तरफ भारत और चीन की  विकास दर बढ़ रही है तो दूसरी तरफ अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था बुरी तरह से चरमरा रही है. अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था केवल 1.8 फीसदी की दर से बढ़ रही है, याने करीब-करीब स्थिर है.अमेरिका में आर्थिक विकास की दर 2011 में 2.3 प्रतिशत होने का अनुमान है, जबकि 2010 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2.9 प्रतिशत थी. प्रति परिवार संपत्ति की कीमत में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है. उपभोक्ताओं की सामान खरीदने की क्षमता में गिरावट आ रही है. मकानों की कीमतें गिर रही हैं और नौकरियों का संकट है. और तो और अब डॉलर की पूछ भी काम हो रही है. रिजर्व करेंसी के रूप में इसके दिन पूरे हो गए हैं. अब चीन की मुद्रा रेनमिनबी (आरएनबी) का ज़माना आ रहा है. अब भारत और चीन के सुपर पावर बनने के संकेंत प्रबल होते जा रहे हैं.

अमेरिका के इन हालातों के बाद अब  चीन और भारत के बीच आर्थिक सुपरपॉवर बनने की होड़ जारी है.  चीन आधिकारिक तौर पर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है.मंदी को ठेंगा दिखाकर भारत तेजी से आगे दौड़ रहा है औए इस मंदी में सबसे मज़बूत आधार हमारा कृषि सेक्टर है. हमारे कमज़ोर सेक्टर हैं भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, प्रांतवाद और पूंजीवाद. अमेरिका में पूंजीवादी नीतियां नाकाम होने के बाद अब  डॉ मनमोहन सिंह और डॉ मोंटेकसिंह अहलुवालिया जैसे पूंजीवादी लीडरों को सबक लेना चाहिए.

Thursday, 6 October 2011

♦ स्‍टीव जॉब्‍स;-व्‍याख्‍यान

भूखें रहें | मासूम रहें | जिज्ञासु रहें | गलतियां करें… ♦ स्‍टीव जॉब्‍स

एपल के जरिये दुनिया को तकनीकी उद्यमिता का सबसे चमकदार चश्‍मा दिखाने वाले स्‍टीव जॉब्‍स अब हमारे बीच नहीं हैं। छह साल पहले स्‍टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच उन्‍होंने एक व्‍याख्‍यान दिया था। वह व्‍याख्‍यान जिंदगी और जज्‍बा के बीच एक बेहद मजबूत पुल की तरह है।
मुझे गर्व है कि मैं आपके साथ हूं, आपकी दीक्षा के दिन। दुनिया के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक में। सच कहूं तो, मैंने कभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी ही नहीं की। कॉलेज के दीक्षांत समारोह के इतना नजदीक मैं पहले नहीं गया। आज मैं आपको अपने जीवन की तीन कहानियां सुनाऊंगा। बस इतना ही, कुछ खास नहीं। महज तीन कहानियां।
पहली कहानी है, बिंदुओं को जोड़ कर देखने के बारे में। रीड कॉलेज को अपने पहले ही छह महीनों में मैंने छोड़ दिया, मगर मैं वहीं पड़ा रहा, अगले करीब 18 महीनों तक, उसे पूरी तरह छोड़ने के पहले। तो आखिर मैंने बीच में ही ये क्यों छोड़ा? ये मेरे जन्म से जुड़ी बात है। मेरी असली मां एक युवा, अविवाहित स्नातक छात्र थीं, और उन्होंने फैसला लिया मुझे गोद देने का। वो इस बात पर अड़ी थीं कि मुझे गोद लेने वाले स्नातक पढ़े-लिखे लोग हों, तो सारा इंतजाम पुख्ता था कि मुझे जन्म लेते ही एक वकील और उनकी पत्नी अपना लेंगे। बस गड़बड़़ इतनी ही हुई कि जब मैं प्रकट हुआ तो उन्होंने ये फैसला लिया कि उन्हें तो एक लड़की चाहिए। तो मेरे अभिभावकों को, जो कि वेट-लिस्ट में थे, रात में ही फोन कर के पूछा गया : “हमारे पास एक नवजात नर शिशु है – क्या आप उसे गोद लेंगे?” उन्होंने कहा : “क्यों नहीं”। मेरी असली मां को बाद में पता चला कि मेरी मां ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं की थी। उन्होंने गोद देने के कागजातों पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कई महीनों बाद इसकी इजाजत दी, जब मेरे माता-पिता ने वादा किया कि मुझे कॉलेज भेजा ही जाएगा। ये मेरे जीवन की शुरुआत थी। और करीब 17 साल बाद, मैं वास्तव में कॉलेज गया। मगर बड़ी मासूमियत से मैंने ऐसा कॉलेज चुना, जो लगभग स्टेनफोर्ड जितना महंगा था, और मेरे कामगार माता-पिता की सारी गाढ़ी कमाई मेरे कॉलेज की फीस में जा रही थी।
छह महीने बीतने पर, मुझे लगा कि इस शिक्षा से खास फायदा नहीं है। मुझे कुछ नहीं पता था कि मैं अपने जीवन के साथ क्या करूंगा और ये भी नही पता था कि ये जानने में कॉलेज कैसे मेरी मदद करेगा। और उसके बावजूद भी मैं, अपने माता-पिता के जीवन भर की कमाई लुटा रहा था। तो मैंने कॉलेज छोड़ने का फैसला लिया और विश्वास किया कि सब ठीक हो जाएगा। उस समय ये डरावना फैसला था, मगर पलट कर देखने से लगता है ये मेरे द्वारा लिये गये सबसे बेहतरीन फैसलों में था।
जिस क्षण मैंने कॉलेज छोड़ा, मैंने उन क्लासों में जाना बंद कर दिया जिनमें मेरी कोई रुचि नहीं थी, और उन सब क्लासों में बैठने लगा, जो मुझे रुचिकर लगती थीं।
ये उतना भी हसीन सफर नहीं था। मेरे पास हॉस्‍टल में कमरा नहीं था, तो मैं दोस्तों के कमरों में फर्श पर सोता था, कोक की खाली बोतलें 5 पैसे में वापस कर के, उससे खाना खरीदता था, और हर रविवार की रात को 7 मील पैदल चलकर हरे-कृष्ण मंदिर में हफ्ते में एक बार ढंग का खाना खाता था।
मुझे ये बहुत अच्छा लगता था। और जो भी मैंने सिर्फ अपनी जिज्ञासा और रुचि के लिए सीखा, वो बाद में जा कर अमूल्य सिद्ध हुआ। चलिए, आपको एक उदाहरण देता हूं…
रीड कॉलेज में उस समय शायद पूरे देश का सबसे अच्छा सुलेख (कैलिग्राफी) कोर्स चलता था। सारे कैंपस में हर पोस्टर, हर खांचे पर लगा हर लेबल बेहतरीन तरीके से हाथ से सुलेखित था। क्योंकि मैं पढ़ाई छोड़ चुका था, और मुझ पर क्लास जाने का दबाव नहीं था, मैंने फैसला किया कि मैं इस कोर्स के जरिये सुलेख लिखना सीखूंगा। मैंने सेंस और सेंस-सेरिफ आदि टाइपफेस सीखे, और अलग-अलग अक्षरों के बीच जगह को बढ़ाना और घटाना सीखा, और कैसे अच्छा सुलेख और टाइपोग्राफी अच्छी बनती है, ये सीखा। वो सुंदर था, ऐतिहासिक था और कलात्मकता से ऐसे ओत-प्रोत जो विज्ञान नहीं समझा सकता, और मैंने स्वयं को उससे बंधा पाया। और इस सब से कभी भी मेरे जीवन में काम आने की कोई आशा नहीं थी। मगर दस साल बाद, जब हम अपना पहला मैकिन्‍टोष कंप्‍यूटर बना रहे थे, वो सब मेरे काम आया। और हमने वो सारी बाते मैक में निहित कर दीं। ये पहला ऐसा कंप्‍यूटर था, जिसमें सुंदर टाइपोग्राफी थी। यदि मैंने वो एक कोर्स अपने कॉलेज में नहीं किया होता, तो मैक में कभी भी तमाम टाइप-फेस और अनुपात में सजे सुंदर फोंट नहीं होते। और क्योंकि विन्डोज ने मैक की नकल ही की है, ये संभव है कि कभी पीसी पर भी वो नहीं ही होते। यदि मैंने कॉलेज बीच में नहीं छोड़ा होता, तो कभी भी मैं सुलेख की उस क्लास में नहीं जा पाया होता, और पर्सनल कंप्‍यूटर में शायद ये रोचक टाइपोग्राफी नहीं होती, जो आपको दिखती है।
जाहिर है जब मैं कॉलेज में था, इन बिंदुओं को जोड़ कर देख पाना असंभव था। लेकिन वो साफ-साफ समझ आ रहा था, उस समय के दस साल बाद।
देखिए, आप भविष्य में जुड़ने वाले बिंदुओं को नहीं जोड़ पाएंगे लेकिन मुड़ कर देखने पर आप उन्हें आसानी से जोड़ सकते हैं। लिहाजा आपको ये विश्वास रखना होगा कि भविष्य में ये बिंदु कैसे न कैसे जुड़ ही जाएंगे। आपको किसी चीज में विश्वास रखना होगा – चाहे उसे अंदर की आवाज कहें, तकदीर कहें, जीवन, कर्म, जो भी कहें। क्योंकि ये मान कर चलना कि ये बिंदु जुड़ेंगे, आपको अपने दिल को काम करने का आत्म-विश्वास देगा। तब भी जब कि आप सबसे अलग रास्ते पर जाएं। और यही आपके जीवन में फर्क लाएगा।
मेरी दूसरी कहानी है प्रेम और क्षति के बारे में। मैं बहुत नसीबवाला था – मुझे जल्दी पता लग गया कि मैं क्या करना चाहता था। वोज और मैंने एप्पल की शुरुआत अपने माता-पिता के गैरिज से की थी, जब मैं 20 साल का था। हमने मेहनत की, और दस साल में एप्पल सिर्फ हम दोनों की कंपनी, जो एक गैरिज में थी, से बढ़ कर 2 बिलियन डॉलर और 4000 कर्मचारियों की हो गयी थी। सिर्फ एक साल पहले ही हमने अपना सबसे अच्छा उत्पाद – मैकिन्टोष – निकाला था, और मैं तुरंत ही 30 वर्ष का हुआ था…
…और फिर मुझे कंपनी से निकाल फेंका गया।
आप उस कंपनी से कैसे निकाले जा सकते हैं, जो आपने शुरू की हो? हुआ ये था कि एप्पल की बढ़त के साथ हमने किसी को कंपनी में रखा था, ये सोच कर कि वो बहुत होनहार है। करीब एक साल तक सब कुछ ठीक चला। पर उसके बाद भविष्य की हमारी योजनाओं में फर्क आने लगा और हम एक दूसरे से पूर्णतः असहमत हो गये। जब ऐसा हुआ, तो हमारे निदेशकों के बोर्ड ने उसका साथ दिया।
मैं तीस साल का था और कंपनी से बाहर था। और बहुत ही शोर-शराबे के साथ बाहर। मेरे वयस्‍क जीवन का एकमात्र केंद्र-बिंदु मेरे जीवन से बाहर था, और ये मेरे लिए सदमा था। मुझे अगले कुछ महीनों तक तो समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूं। मुझे लगा कि मैंने उद्यमियों की पीढ़ियों को शर्मसार कर दिया है। कि जैसे ही रिले-रेस का डंडा मेरे हाथ आया, मैंने उसे गिरा दिया। मैं डेविड पकार्ड (एचपी के संस्थापक) और बॉब नोयेस से मिला और इतने खराब प्रदर्शन के लिए माफी मांगी। मेरी असफलता जग-जाहिर हो गयी थी। मैं बदनाम था। मुझे लगा कि मैं सिलिकोन-वैली से भाग जाऊं…
…मगर धीरे-धीरे मेरे अंदर एक बीज स्फुटित हुआ। मैं अब भी उसे प्यार करता था, जो मैं करता था। एप्पल में हुए घटनाक्रम ने मेरे और मेरे काम के बीच के लगाव को जरा भी कम नहीं किया था। मेरा तिरस्कार किया गया था, मगर अब भी मुझे इश्क था। और मैंने फैसला किया कि मैं फिर से शुरुआत करूंगा।
मैं तब ये नहीं देख पा रहा था, मगर एप्पल से निकाल दिये जाने से अच्छा मेरे जीवन में आज तक कुछ हुआ ही नहीं। सफलता में चूर होने के भारी-भरकम बोझ की जगह नौसिखिया होने की ताजगी ने ले ली थी, हर बात के बारे में कम सुनिश्चितता। इसने मुझे मेरे जीवन के सबसे रचनात्मक दौर में प्रवेश दिया। अगले पांच साल में, मैंने “नेक्स्ट” नाम की कंपनी शुरू की, फिर एक और “पिक्सार” नाम की कंपनी, और मुझे उस औरत से इश्क भी हुआ, जो बाद में मेरी पत्नी बनने वाली थी। पिक्सार ने कंप्‍यूटर पर रची गयी विश्व की पहली कार्टून फिल्म बनायी – टॉय स्टोरी, और आज वो विश्व की सबसे सफल कंप्‍यूटर एनिमेशन की कंपनी है। आश्चर्यजनक घटनाक्रम में, एप्पल ने नेक्स्ट को खरीद लिया, और मैं वापस एप्पल आ गया, और जो तकनीकें हमनें नेक्स्ट में विकसित की थीं, वो एप्पल के दुबारा जीवंत होने के लिए जिम्मेदार हैं। और लौरीन और मेरे पास एक सुंदर सुखी परिवार है।
मेरा यकीन है कि ऐसा कुछ न हुआ होता, यदि मैं एप्पल से निकाला न गया होता।
दवा का स्वाद अत्यंत कड़वा था, मगर शायद मरीज को उसकी निहायत जरूरत थी। कभी-कभी जीवन आपके सर को चट्टानों तले कुचलता है। उस समय अपना विश्वास मत छोड़िए। मैं आश्वस्त हूं कि केवल एक कारण से मैंने हार नहीं मानी – ये कि मुझे अपने काम से प्यार था। आपको ढूंढ़़ना होगा कि आप किसे प्यार करते हैं। ये बात आपके काम और आपके प्रेमियों पर बराबर लागू होती है। आपका काम आपके जीवन का एक बड़ा हिस्सा होगा, और इसलिए संतुष्ट रहने का एकमात्र तरीका है वो करना, जो आपको महान काम लगता हो। और महान काम करने का एकमात्र तरीका है, वो करना जिस से आपको प्रेम हो। यदि वो आपको अभी तक नहीं मिला है, तो ढूंढ़ते रहिए। ठहरिए मत। आशा मत छोड़िए। दिल के बाकी मामलों की तरह, आपको पता लग जाएगा जब वो आपको मिलेगा। और किसी भी महान दोस्ती की तरह, साल दर साल ये और बेहतर और बेहतर होता जाता है। तो ढूंढ़िए जब तक वो आपको न मिले। ठहरिए मत।
मेरी तीसरी कहानी है, मृत्यु के बारे में। जब मैं 17 साल का था, तो मैंने कह ये सूत्र पढ़ा था : “यदि हर दिन को जीवन के आखिरी दिन मान कर जियोगे, तो एक दिन जरूर तुम सही होगे।” उसने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी… और तब से, पिछले 33 साल से, मैंने हर सुबह खुद को शीशे में देख कर पूछा है : “अगर ये मेरे जीवन का आखिरी दिन हो, तो क्या मैं वही करना चाहूंगा, जो मैं आज करने जा रहा हूं?” और जब भी लगातार कई दिनों तक इसका नकारात्मक जवाब मिलता है, मुझे पता लग जाता है कि कुछ बदलना जरूरी है। ये याद रखना कि मैं जल्द ही मर जाऊंगा, सबसे महत्वपूर्ण तरीका है जीवन के बड़े फैसले लेने का। क्योंकि लगभग सब कुछ – आपसे की जाने वाली आशाएं, सारा गर्व, असफलता का सारा डर, शर्मिंदगी से भय … ये सब मृत्यु के सामने बेमानी हो जाता है, और वही बचता है जो सबसे जरूरी है। ये याद रखना कि कि आपको एक दिन मरना ही होगा, सबसे अच्छा तरीका है जो मुझे पता है इस सोच द्वारा छले जाने का कि आप के पास खोने को कुछ है। दरअसल, आप तो पहले ही नंगे हैं। कोई कारण ही नहीं है अपने दिल की बात नहीं मानने का।
करीब एक साल पहले पता लगा कि मुझे कैंसर है। सुबह 7:30 पर एक जांच हुई, और उसने मेरी पाचक-ग्रंथि में एक ट्यूमर दिखाया। मुझे तो ये तक नहीं पता था कि पाचक-ग्रंथि होती क्या है। डॉक्टरों ने मुझे बताया कि इस तरह के कैंसर का कोई इलाज नहीं है, और मैं ज्यादा से ज्यादा तीन से छह महीने जीवित रहूंगा। मेरे डॉक्टर ने मुझे घर जा कर अपने काम-काज ठीक करने को कहा, जिसका मतलब है – मरने के लिए तैयार हो जाओ। इसका मतलब है कि कोशिश करो अपने बच्‍चों को वो सब बताने की, जो आप अगले दस साल में बताना चाहता थे, अब सिर्फ कुछ महीनों में ही। इस का मतलब है कि वो सब काम कर डालो, जिससे कि आपके परिवार को आपकी मृत्यु से कम-से-कम कष्ट हो। इसका मतलब है अलविदा कह लो।
मैं सारे दिन इस फैसले के साथ ही जिया। उस शाम को मेरी बायोप्सी हुई, और उन्होंने एक एन्डोस्कोप मेरे गले में उतारा, मेरे पेट से होते हुए, मेरी आंतों में, और मेरी पाचक-ग्रंथि के ट्यूमर में से कुछ सेल निकाले। मुझे बेहोश कर दिया गया था, मगर मेरी पत्नी, जो वहां थीं, ने मुझे बताया कि जब उन्होंने सूक्ष्म-दर्शी से उन सेलों को देखा, तो डॉक्टरों को रोना आ गया क्योंकि मेरा कैंसर पाचक-ग्रंथि के उन गिने-चुने कैंसरों में से था, जिसका इलाज संभव था। मेरी शल्य-क्रिया हुई, और भाग्य से, मैं अब ठीक हूं। मृत्यु के इतने करीब मैं कभी नहीं गया, और मैं चाहता भी नहीं अगले कुछ दशकों तक मैं और करीब जाऊं।
इस आपदा को झेल कर मैं आज आपसे और भी निश्चितता से कह सकता हूं कि मृत्यु एक उपयोगी मगर केवल सुनने में अच्छा लगने वाली संरचना है : कोई भी मरना नहीं चाहता। यहां तक कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, लेकिन वहां जाने के लिए मरना नहीं चाहते। और इसके बावजूद, मृत्यु हम सबकी साझी मंजिल है। कभी भी कोई भी इस से बच नहीं सका है। और ये ठीक भी है, क्योंकि मृत्यु शायद जीवन का महानतम अविष्कार है। ये जीवन का बदलाव लाने वाला मुनीम है। ये प्राचीन को हटा कर नवीन के लिए जगह बनाता है। इस समय आप ही नवीन हैं, मगर जल्द ही एक दिन आएगा, जब आप प्राचीन होंगे और आपको हटा दिया जाएगा।
इतनी नाटकीयता के लिए माफी चाहता हूं, मगर ये शाश्वत सत्य है। आपका जीवनकाल सीमित है; उसे दूसरे किसी की जिंदगी जीने में व्यर्थ न कीजिए। सिद्धांतों में मत फंसिए – जो कि दूसरों की सोच का निष्‍कर्ष है। दूसरों के मतों के शोर द्वारा अपनी अंदरूनी आवाज का कत्ल मत होने दीजिए। और सबसे जरूरी, अपने दिल और अपने मन की बात करने की हिम्मत रखिए। दिल और मन को पता होता है कि आप सच में क्या बनना चाहते हैं। बाकी सब द्वितीय है।
जब मैं युवा था, द होल अर्थ कैटालाग नाम का एक प्रकाशन होता था, जो कि मेरी पीढ़ी के लिए बाइबल जैसा था। उसे स्टीवार्ट ब्रांड नाम के एक व्यक्ति ने बनाया था, यहीं पास में ही – मैनलो पार्क में, और उसने अपने काव्यात्मक अंदाज से इसमें जान फूंक दी थी। ये 60 के दशक के अंत में हुआ था, पर्सनल कंप्‍यूटर वगैरह आने के पहले, और इसे टाइपराइटरों, कैंचियों और पोलारायड कैमरों की मदद से रचा गया था। ये गूगल के पेपरबैक रूप की तरह था, गूगल के आने के करीब 35 साल पहले : ये आदर्शवादी था, और पटा पड़ा था जादुई तरीकों, और महान आइडियों से। स्टीवार्ट और उसकी टीम ने द होल अर्थ कैटालाग के कई संस्करण निकाले, और फिर जब वक्त आ गया, तो उसका एक आखिरी संस्करण निकाला। ये सत्तर के दशक के बीच हुआ, और मैं आपकी ही उम्र का था। उस आखिरी संस्करण के पीछे गांव की एक सड़क की सुबह ली गयी तस्वीर थी, जैसी सड़क पर आप स्वयं को पाएंगे यदि आप बहुत उत्साही हों। उसके नीचे ये शब्द लिखे थे : “भूखे रहें। मासूम रहें।” (Stay Hungry… Stay Foolish… जिज्ञासु रहें, गलतियां करें।) जाते जाते वो ये ही विदाई – संदेश दे कर गये थे। भूखे रहें। मासूम रहें। और मैं अपने लिए सिर्फ यही दुआ करता हूं। और आपके दीक्षांत समारोह पर, मैं आपके लिए भी यही दुआ करता हूं। भूखे रहें। मासूम रहें। (जिज्ञासु रहें। गलतियां करें।)
आप सब का बहुत धन्यवाद।

अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे

पहले तहरीर स्क्वायर, फिर रामलीला और अब वॉल स्ट्रीट
-----------------------------------------------------------------------
अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे  
-------------------------------
अमीन कुरेशी
------------------
फरवरी  2011 में  काहिरा के तहरीर स्क्वायर में 12 दिन के शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने मिस्र में 30 साल से राज कर रहे हुस्नी  मुबारक की सत्ता पलट दी. इस प्रदर्शन के बाद दुनिया के कई देशों में अलग अलग मुद्दों को लेकर आन्दोलन शुरू है. भ्रष्टाचार को लेकर हमारे देश में  भी अन्ना हजारे का दिल्ली के रामलीला मैदान पर ऐतिहासिक अनशन हुआ. आन्दोलन की यह हवा अब अमेरिका तक पहुँच गई है.
कारपोरेट लूट के कारण बेरोजगारी, आर्थिक संकट एवं अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव बरते जाने जैसे कई मुद्दों को लेकर वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो के आह्वान के साथ सैकड़ों लोगों का जारी विरोध-प्रदर्शन देश भर में फैल गया है।
न्यूयार्क से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शनों का दौर बोस्टन, शिकागो, सन फ्रांसिस्को होता हुआ देश भर में फैल गया है। मैनहट्टन में कुछ प्रदर्शनकारियों ने  अपने चेहरे पर सफेद रंग पोत कर मार्च निकाला। वहीं शिकागो में प्रदर्शनकारियों ने ड्रम पीटकर विरोध जताया। बोस्टन, सेंट लुइस, केंसास, लास एंजिल्स और अन्य शहरों में प्रदर्शनकारियों ने विरोधस्वरूप रास्ते से गुजर रहे वाहनों को झंडे-बैनर दिखाए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया।
नित नए संगठनों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ने के कारण प्रदर्शन और व्यापक होते जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी लोगों को इससे जोड़ने के लिये वेबसाइटों एवं वीडियो का सहारा ले रहे हैं। गौरतलब है कि यह विरोध प्रदर्शन गत 17 सितंबर को शुरू हुआ था जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने न्यूयार्क शेयर बाजार के सामने तंबू गाड़ने की कोशिश की थी। इसके बाद सैकड़ों लोगों ने निकटवर्ती पार्क में शिविर बना लिए और संगठित रूप से विरोध शुरू कर दिया।
उन्होंने न सिर्फ चिकित्सा सुविधाओं और कानूनी सहायता का इंतजाम किया बल्कि आक्युपाय वाल स्ट्रीट जर्नल के नाम से अपना अखबार निकालना भी शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया और लोगों को तितर बितर करने के लिए उन पर काली मिर्च का छिड़काव किया।
पुलिस ने स्थानीय ब्रुकलिन ब्रिज से करीब 700 लोगों को बिना इजाजत मार्च निकालने और ट्रैफिक व्यवस्था ठप करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने ब्रुकलिन ब्रिज को यातायात के लिए पुन: खोल दिया।
अमरीका में वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो आंदोलन अन्य पश्चिमी देशों तक पहुंच गया है। आस्ट्रेलिया में लोगों ने मेलबर्न पर अधिकार करो के नारे के साथ  मेलबर्न में व्यापक प्रदर्शन की घोषणा की है। इसी प्रकार सिडनी पर अधिकार करो के नारे के साथ  सिडनी में भी प्रदर्शन की घोषणा की गयी है। यह ऐसी स्थिति में है कि अमरीका के विभिन्न नगरों में "वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो" आंदोलन जारी है।
 न्यूयार्क, शिकागो, बोस्टन, लास एंजिल्स आदि महत्वपूर्ण अमेरिकी शहरों में बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. लोग पूरी तैयारियों के साथ विरोध प्रदर्शन के लिये जुटे हैं. ठंढ से बचाव के लिये गर्म कपडे, किताबें, दवाइयां, खाने-पीने की दूसरी चीजों से लैस होकर लोग प्रदर्शन के लिये आए हैं. विरोध की गंभीरता और सघनता का पता इसी से चलता है कि वे शायद पूरे जाडे के मौसम तक टिकने का बंदोबस्त किये बैठे हैं.
 अमेरिका में भारतियों की हालत भी ठीक नही है. ओबामा ने आउट सोर्सिंग पर रोक लगा कर उन कंपनियों पर अतिरिक्त कर लगा दिया है जो एशिया के लोगों को नौकरी दे रही हैं. आपको याद होगा कुछ दिन पहले ओबामा ने अमेरिका से कहा था कि भरतीय बच्चों से सावधान रहें, क्यों कि उनका गणित और भौतिक शास्त्र पक्का होता है. कहने का अर्थ था भारतीय अमेरिका में कब्ज़ा जमाते जा रहे है.
अमेरिका में दो साल पहले शुरू हुई मंदी वहां के बड़े बैंकों की गलत नीतियों का अंजाम थीं। अमरीका में जनता आर्थिक संकट और बेरोज़गारी में वृद्धि का ज़िम्मेदार, अमरीकी बैंकरों को मानती  है।  मुहिम में शामिल लोग अमेरिकी समाज में लोगों की आमदनियों में बढ़ते फासले और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार पूंजीपतियों के हितों का ज्यादा ध्यान रख रही है। कुछ जगहों पर इसे पूंजीवादी व्यवस्था के विरोधियों का एक गठबंधन भी बताया जा रहा है। कई मज़दूर संगठनों ने इस मुहिम को अपना समर्थन देने की घोषणा की है.

पूंजीवाद के नये पैंतरे के रूप में भूमंडलीकरण को आये हुये महज दो ही दशक हुये हैं कि ये स्थिति आ गयी. कभी न कभी पूंजीवाद के खिलाफ लोग लामबंद होंगे, यह तय था, लेकिन इतनी जल्दी होंगे, यह पता नहीं था. तो  
 क्या अब अमेरिकी की पूंजीवादी नीतियां उसके लिए अब खतरनाक साबित हो रही हैं? क्या अमेरिका इस संकट से आसानी से निकल पाएगा? क्या अमेरिका की मुश्किलों का असर दूसरे देशों पर पड़ेगा? हालांकि इसे मिस्र के तहरीर चौराहे जैसी क्रांति नहीं मानी जा रही है लेकिन अमरीकी पूंजीवाद के केंद्र - वॉल स्ट्रीट पर हो रहा ये प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि आर्थिक मंदी किस तरह अमरीका में बदलाव ला रही  है.

हल ही में अन्ना के आन्दोलन में अमेरिका ने भारत को संयम बरतने की सीख दी थी. जिसका भारत ने यह कहकर विरोध किया था कि अमेरिका देश के अंदरूनी मामलों में दखल न दे. अब अमेरिका को अन्य देशों के मामलों  को छोडकर अपने मामले सुलझाने चाहिए. अन्य देशों को मानवाधिकारों की रक्षा और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर ध्यान देने का उपदेश देने वाली अमरीकी सरकार, "वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो" आंदोलन के प्रदर्शनकारियों का खुद दमन कर रही है।

Wednesday, 28 September 2011

डबल टैक्स, मल्टी मर्डर

डबल टैक्स, मल्टी मर्डर
-------------------------
अमीन कुरेशी
----------------
-२७ रुपये टैक्स ने ली जान ?
-रोड टैक्स है तो  टोल टैक्स क्यों ?
-पालिका में डबल टैक्स क्यों ? 
-और कितने लगेंगे टैक्स ?
---------------------
 
 
    हल ही में दिल्ली के पास एक्सप्रेस-वे पर टोल बैरियर पर तैनात एक कर्मचारी की बोलेरो सवार व्यक्ति ने गोली मार कर हत्या कर दी। इस गाड़ी में एक ही व्यक्ति सवार था। उमेश कांत ने उसे टोल देने के लिए कहा तो उसने टोल देने से मना कर दिया। टैक्स को लेकर दोनों में कहासुनी हो गई। बात बढ़ती देख उमेश कांत ने बूम को उठा दिया। जैसे ही बुम उठा तो बोलेरो सवार ने अपनी गाड़ी को कुछ आगे किया और हथियार निकाल कर उमेश कांत की गर्दन पर गोली मार दी। गोली लगते ही उमेश कांत अपने कैबिन में ही ढेर हो गया और बोलेरो सवार मौके से फरार हो गया।
 
   कर्मचारी की हत्या मात्र २७ रुपये टैक्स देने को लेकर की गई। हत्यारे पकड़े भी गए और सजा भी हो जाएगी. सवाल यह उठता है कि हमारी व्यवस्था के विरुद्ध समाज में जो गुस्सा और कुंठा भर गई है आखिर वह कहाँ निकले.  वैसे भी घर परिवार का तनाव लोगों पर पहले से हावी होता है और ऐसे में व्यवस्था की गड़बड़ी झेलते झेलते कुछ लोग अपना आप खो बैठते हैं.
 
   टोल बैरियर पर तैनात कर्मचारी की गोली मार कर हत्या का कारण युवकों ने टोल टैक्स बताया. उनका कहना है कि वे पास के गाँव में रहते हैं और दिन में दस बार उनको टोल नाका पार करना होता है. आखिर कब तक वे टोल टैक्स भरें. बात इन गांववालों की सही है. यह झगड़ा देश के हर कोने में टोल प्लाज़ा के पास के गाँव और बार बार आने जाने वाले टैक्सी  चालकों में होता है. अन्य टोल नाकों पर भी आन्दोलन और मारपीट आम बात होती जा रही है.
 
   टोल नाके को लेकर दो अहम् सवाल हैं. एक तो यह है कि जब सभी वाहन चालक मोटी रकम के रूप में लाइफ टाईम रोड टैक्स  भर देते हैं तो फिर  सड़क के उपयोग और मरम्मत के लिए अलग से टोल टैक्स क्यों वसूला जा रहा है. इस तरह से डबल टैक्स के प्रति  नागरिकों का गुस्सा स्वाभाविक है. परिवहन विभाग यो तो रोड टैक्स  ले या टोल टैक्स  ले. आज कल हर रोड पर टोल प्लाज़ा बन गए हैं. पांच  पच्चीस कि मी जाने आने पर जितना पेट्रोल नही लगता उससे ज्यादा टोल टैक्स  लग जाता है. इससे परेशान हो कर आसपास के गाँववालों अब टोल नाकों पर हिंसा शुरू कर दी है.
 
     डबल टैक्स  की मार सिर्फ सड़क पर ही नही है. कई अन्य जगह भी यह घुमा फिरा कर वसूला जा रहा है.  निकायों अर्थात पालिका की तरफ से भी तीन टैक्स डबल वसूले जाते हैं. पहला है एजुकेशन टैक्स. पालिका के बिल यह दो तरह से वसूला जाता है. एक तो पालिका का एजुकेशन टैक्स और दूसरा राज्य सरकार का एजुकेशन टैक्स. फिर भले ही उस पालिका के एरिया में राज्य सरकार का कोई स्कूल न हो और पालिका के स्कूल में आपका बच्चा न पड़ता हो. डबल टैक्स आपको भरना ही है. इसी तरह जल-मल निकासी टैक्स अर्थात सीवेज टैक्स और सीवेज बेनिफिट टैक्स. इसी तरह सफाई शुल्क और विशेष सफाई शुल्क.  
 
पालिका, राज्य सरकार और केंद्र सरकार का दर्ज़नों टैक्स लेने के बाद भी पेट नहीं भर रहा है. इसलिय टैक्स वसूलने के नए नए रास्ते खोजे जाते हैं और इन रास्तों पर अब खून बहने लगा है.  
------------------------------
 
 


 

Saturday, 10 September 2011

पाकिस्तान का नया बम

पाकिस्तान का नया बम
अमीन कुरेशी
पाकिस्तान का नया बम , पाकिस्तान को मिला एक नया खुफिया हथियार, पाक बम भारत आया....और इस तरह की कई अन्य सुर्खियाँ  अख़बारों में पड़ने को मिलीं, जब पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर ने भारत का दौरा किया. हिना ने अपनी खूबसूरती, अदा, अंदाज़ और फेशन से न सिर्फ मीडिया का दिल जीता बल्कि राजनेताओं से भी कूटनीतिक रिश्ते बनाने में भी सफल रहीं.
हिना रब्बानी खर अपने देश की पहली महिला विदेश मंत्री हैं जो इस्लामाबाद की छवि सुधारने में सफल होती दिख रहीं है. संभवतः पाकिस्तान का कोई कट्टर छवि वाला पुरुष नेता यह  चमत्कार नहीं कर पता. जिस तरह से कम्पनियाँ मार्केटिंग के लिए खूबसूरत महिला एक्सिकिटिव के जरिये कारोबार में इजाफा करतीं हैं उसी तरह पाकिस्तान ने इस मार्केट मंत्र का इस्तेमाल अपने कूटनीतिक रिश्ते सुधारने के लिया बखूबी किया है.
मुंबई में बम विस्फोट कि  छाया में हिना ने भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्ण से आत्मविश्वास के साथ हाथ मिलाते हुए घोषणा की कि ये एक नए युग की शुरुआत हैं. इससे भारत-पाक के बीच कश्मीर मुद्दे पर नजदीकी आई है. रियायतों पर रजामंदी  हुई है , जो कश्मीर विवाद को नरम करने में मददगार हो सकते हैं. भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर दूसरी बातों के अलावा इस पर सहमत रहे कि कश्मीर के दोनों हिस्सों में व्यापार को बढ़ाया जाए. इसके अलावा विभाजित इलाके में रहने वाले लोग एक दूसरे इलाके में आसानी से जा आ सकेंगे.
हिना ने कहा है कि वे पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी जनता की ओर से शुभकामनाएँ लेकर  आई हैं.दोनों देशों ने इतिहास से बहुत कुछ सीखा है. आशा है कि हम अच्छे,  पड़ोसी के रूप में आगे बढ़ सकते हैं.एक-दूसरे के भविष्य में हमारी हिस्सेदारी है और दोनों देश क्षेत्र के प्रति और क्षेत्र के अंदर अपनी जिम्मेदारियों को महसूस करते हैं.
कुल मिला कर यह  एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत है. पाकिस्तान और उसकी विदेश मंत्री ने मीडिया और नेताओं पर अच्छी छाप छोड़ी है. चाहे पाकिस्तान हो या बंगला देश कट्टरता के बावजूद वहां राजनीती के शिखर पर महिलाएं ही अपना परचम लहरातीं है. हिना भी बेनजीर की तरह एक दिन पाक की शीर्ष नेता होंगी.हिना का आकर्षण और कम  उम्र पाकिस्तान को एक नरम छवि देने में मदद दे सकता है.  कुरूप देश का यह सुंदर चेहरा विश्व की सबसे युवा विदेश मंत्री के लिए कुछ भी ऐसा नहीं जो हासिल नहीं किया जा सके बशर्ते विदेश और सुरक्षा नीति में पाक सेना का दखल न हो और हिना को आज़ादी मिले खिलने की और पूरी दुनिया में महकने की.
----------------

आज़ादी की एक लड़ाई और

आज़ादी की एक लड़ाई और
अमीन कुरेशी
भारत सरकार के सचिवों के समूह ने मल्टीब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब विदेशी कंपनियां   मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 फीसदी तक निवेश कर सकेंगी।  वाल-मार्ट, केयरफॉर और टेस्को जैसे अंतर्राष्ट्रीय रिटेल कारोबारियों के लिए भारत में साझेदारी के माध्यम से प्रवेश करना सम्भव हो जाएगा। मूल प्रस्ताव में राज्य सरकारों की मंजूरी लेना ज़रूरी था लेकिन अब यह शर्त भी हटा दी गयी है. इस राह में भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश विरोध कर सकते थे । इसके अलावा पश्चिम बंगाल में तृणमूल की सरकार भी मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई का विरोध कर रही है। औद्योगिक नीति एवं संवद्र्घन विभाग द्वारा कई विभागों के सदस्यों को मिलाकर बनाई गई समिति ने देश भर से इस मामले पर 175 लोगों की प्रतिक्रिया ली और उसका विश्लेषण किया। विश्लेषण में पता चला कि इस कदम का विरोध करने वाले 109 प्रतिभागियों में से 73 छोटे कारोबारी और रिटेल संगठन थे। इसके अलावा स्थानीय विनिर्माताओं और गैर सरकारी संगठनों ने भी पहल का विरोध किया है। जबकि फिक्की, सीआईआई और भारतीय रिटेल संगठनों ने मल्टीब्रांड में एफडीआई को कारोबार के लिए बेहतरीन पहल बताते हुए इसका समर्थन किया है।
हालांकि मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी के तहत 10 करोड़ डॉलर से कम विदेशी निवेश की इजाजत नहीं होगी। इसके अलावा मल्टीब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश का 50 फीसदी हिस्सा बैक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाना होगा। ईजीओएम की बैठक में मल्टीब्रैंड रिटेल स्टोर की कुल बिक्री का 30 फीसदी हिस्सा छोटे रिटेलर्स को बेचना का प्रस्ताव मंजूर हुआ है। इसके अलावा 10 लाख या उससे ज्यादा की जनसंख्या वाले शहरों में ही मल्टीब्रैंड रिटेल की छूट देने का प्रस्ताव है। हालांकि मल्टीब्रैंड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई के प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट कमिटी के पास भेजा जाएगा। इसके बाद संसद कें बहस होगी.
फिलहाल इस पर बहस जरी है. रिटेलर्स एसोसिएशन के मुताबिक मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई आने से सप्लाई चेन सुधरेगी और इससे महंगाई में कमी आएगी। इसके अलावा वेस्टेज भी कम होगा।वहीं फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी ने मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी पर खुशी जताई। किशोर बियानी के मुताबिक मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से देश के रिटेल कारोबार को काफी फायदा होगा। किशोर बियानी का मानना है कि मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से कई कंपनियां रिटेल सेक्टर में अपना कारोबार शुरू करने के लिए आगे आ सकती हैं। साथ ही मल्टीब्रैंड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी से विदेशी कंपनियों को बड़ा बाजार मिलने की उम्मीद होगी।
 मल्टीब्रैंड  रिटेल में न्यूनतम 10 करोड़ डॉलर के एफडीआई को अनुमति दी है। इसके साथ ही एफडीआई वाले  मल्टीब्रैंड  स्टोर उन्हीं शहरों में खोले जा सकते हैं, जिनकी आबादी 2011 की जनगणना के आधार पर 10 लाख से अधिक है। 2001 की जनगणना के अनुसार इस दायरे में फरीदाबाद, वडोदरा, इंदौर, जबलपुर, अमृतसर, इलाहाबाद, वाराणसी, राजकोट समेत 35 शहर आते हैं। जबकि 2011 की जनगणना के आधार पर इन शहरों की संख्या और अधिक हो सकती है। हालांकि इस मामले पर पहले समिति में मतभेद थे लेकिन अब सभी राज्यों की राजधानियों में मल्टीब्रांड एफडीआई को अनुमति देने पर सहमति बनती नजर आ रही है। जबकि इससे पहले कुछ मंत्री इसे महज 6 महानगरों तक ही सीमित करने की सिफारिश कर रहे थे, जिससे इस पर आसानी से निगरानी रखी जा सके।
उद्योग जगत के जानकारों और आर्थिक सलाहकारों का मानना है कि  मल्टीब्रैंड  रिटेल क्षेत्र में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जहां एक ओर रिटेल क्षेत्र का आधुनिकीकरण होगा, वहीं महंगाई दर में भी कमी आएगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के महासचिव राजीव कुमार ने कहा, “”यह एक ब़डा फैसला है। हम चाहते हैं कि यह जल्द-से-जल्द शुरू हो।”"  कुमार ने कहा कि इनके प्रवेश से भारत के रिटेल क्षेत्र में नयापन आएगा। इसके साथ ही इससे महंगाई दर भी घटेगी, जो आज एक ब़डी समस्या बन गई है। एसोचैम के महासचिव डी.एस. रावत ने कहा कि इस कदम से न सिर्फ विदेशी निवेशकों, बल्कि भारतीय निवेशकों के बीच भी अच्छा संकेत जाएगा, जो यह मानकर चल रहे थे कि सरकार ब़डा फैसला नहीं ले सकती है। रावत ने कहा, “”सरकार ने पिछले कुछ समय से ब़डा फैसला नहीं लिया था। यदि सरकार इस सुझाव को मानती है, तो इसका हर क्षेत्र में बेहतर संकेत जाएगा।”" उन्होंने हालांकि कहा कि यह तो सिर्फ पहला कदम है। इसे अभी कई बाधाएं पार करनी है। सचिवों की समिति ने अपना सुझाव मंत्रिमंडलीय समिति को भेज दिया है। अब प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रीमंडलीय समिति इस पर विचार करेगी। सरकार के लिए इस पर फैसला लेना कठिन होगा, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य कई विपक्षी पार्टियां यह कहकर इस कदम का विरोध कर रही हैं कि बहुराष्ट्रीय रिटेल कम्पनियां छोटे-मोटे दुकानदारों तथा कारोबारियों को बाजार से खदे़ड देंगी।
डिलॉयटी के निदेशक गौरव गुप्ता ने कहा, “”सुपरबाजारों के काम करने का तरीका छोटे कारोबारियों से अलग होता है। मैं नहीं समझता कि ये सुपरबाजार छोटे कारोबारियों के लिए खतरा हैं।”" गुप्ता ने कहा कि समिति ने कम से कम 10 करो़ड डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा तय की है, इसलिए छोटे कारोबारियों को खतरा नहीं है। समिति ने सुझाव दिया है कि कुल निवेश का कम से कम आधा हिस्सा शीत भंडार जैसे आधारभूत संरचना में निवेश होना चाहिए। देश में अभी एकल ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी और कैश एंड कैरी थोक कारोबार में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत है। वालमार्ट जैसी अंतर्राष्ट्रीय रिटेल कम्पनियों ने पहले से यहां रणनीतिक साझेदारी के तहत कैश एंड कैरी कारोबार शुरू कर दिए हैं और जल्द-से-जल्द अपने सुपरबाजार भी शुरू करना चाहती हैं।
लेकिन देश के आम लोगों की राय है कि गली -मोहल्ले की मोहन सेठ ,धरमू काका ,खान चाचा की दुकान, ये सब सपना बन कर रह जायेगी. अमेरिका को देश को लूटने की खुली छूट दी जा रही है.किराने की दुकान चला ने वाले ,रेहडी वाले ,ट्रांसपोर्टर ,हम्माल ,कर्मचारी बेरोजगार हो जायेगे.किसानो को भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा. इस देश मैं अब कोई विपक्ष बचा नहीं है. इस अमेरिकी लूट के लिए हमारी सरकार ने लूटेरो को देश की चाबी दे दी हैं.
भारतीय खुदरा कारोबार का एक अनोखा ढांचा है। राशनिंग के साथ शुरू हुआ इसका सफर कपड़ा और फुटवियर रिटेल से होकर गुजरा है। 1990 के दशक के आखिर में इसने तेजी पकड़ी। मौजूदा दौर में भी भारत दुकानदारों का देश है जहां करीब 1.5 करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और यह तकरीबन 350 अरब डॉलर से भी बड़ा बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार में असंगठित क्षेत्र का दबदबा है और कुल बिक्री का 94 फीसदी कारोबार इनके जरिये ही होता है। बहुरास्ट्रीय कंपनियों की लालची नजर इस पर हैं.देश एक बड़े संकट की और बड़ रहा है. आज़ादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी थी और अब अमेरिकी कम्पनियाँ हैं. हो सकता है कि कुछ सालों बाद आज़ादी की एक लडाई और लड़ना पड़े.

अमेरिका का दखल

अमेरिका का दखल
अमीन कुरेशी
अपने आप को पूरी दुनिया का दरोगा समझने  वाले अमेरिका का हमारे देश के मामलों में दखल अब इतना बड़ गया है कि वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. आर्थिक नीतियों, सामरिक और विदेश नीतियों में तो अमेरिका का दखल है ही अब  वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. भारत में होने वाले आंदोलनों को कैसे संभाला जाए इसकी नसीहत अमेरिका ने भारत को दी है. वास्तव में अमेरिका , भारत में होने वाले आंदोलनों को हवा दे कर अस्थिरता पैदा करना चाहता है. शांति उसे सूट नहीं करती है. अशांति होने पर उसको दखल देने का मौका मिलता है. फिर उस देश पर हमला करने का वह नैतिक अधिकार बताता है. हमले के बाद उस देश के सन साधनों पर कब्ज़ा कर कठपुतली सरकार बैठाता है. इस तरह वह कई देशों में घुसपैठ कर चुका है. अब उसके निशाने पर भारत है.
यह सही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में अमरीका की ओर से मिली नसीहत पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है लेकिन यह काफी नहीं है. अमेरिकी  विदेश मंत्रालय की नियमित ब्रीफ़िंग के दौरान प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में संयम बरतना चाहिए. विक्टोरिया न्यूलैंड से ये पूछा गया था कि भारत में आजकल नियमित प्रदर्शन हो रहे हैं और पुलिस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और भ्रष्ट राजनेताओं के ख़िलाफ़ लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचल रही है, क्या वे इससे चिंतित हैं?
इस सवाल के जवाब में अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड का कहना था- जैसा कि आप जानते हैं कि हम दुनियाभर में शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के अधिकार का समर्थन करते हैं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हम उम्मीद करते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में उचित संयम बरतेगा.
सवाल पूछने वाले ने 16 अगस्त से अन्ना हज़ारे के प्रस्तावित अनशन का भी ज़िक्र किया और कहा कि भारत के स्वतंत्रता दिवस के बाद का दिन प्रदर्शनों के हिसाब से बड़ा हो सकता है, क्योंकि इस दिन भारत में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक बड़ा प्रदर्शन होने वाला है.
लेकिन भारत ने अमरीकी विदेश मंत्रालय की टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में इसे ग़ैर ज़रूरी बताया गया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है- हम अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता का ग़ैर ज़रूरी बयान देखा है, जो उन्होंने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने पर दिया है. भारतीय संविधान में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का उल्लेख है, जिसका इस्तेमाल भारत के 1.2 अरब नागरिक करते हैं. जून में काले धन को लेकर बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे और दिल्ली पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करके अनशन बंद करा दिया था. दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की काफ़ी आलोचना हुई थी.
सवाल यह उठता है कि  विक्टोरिया न्यूलैंड के सामने यह सवाल क्यों उठाया गया. क्या इस तरह के सवाल उठाने वाले पत्रकार अमेरिका के इशारे पर ही इस तरह के सवाल करते हैं. यदि सवाल पूछ भी था तो  विक्टोरिया न्यूलैंड को जवाब देना था कि यह भारत का आन्तरिक मामला है. सच तो यह है कि अमेरिका को हमने  सर चढ़ा रखा है. अब भी समय है संभलने का. कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो जाए.

Sunday, 3 July 2011

शबे बारात

शबे बारात यानी मुक्ति की रात
रमजान उल मुबारक के 15 दिन पूर्व मनाया जाने वाला विशेष इबादत का त्योहार है शबे बारात. शब का अर्थ है रात और बारात या बराअत का अर्थ है मुक्ति या निजात. अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की बारगाह में शबे बारात की रात हर इंसान की ऑडिट रिपोर्ट तैयार होती है। जिसमें उनके भले-बुरे कामों का लेखा-जोखा होता है। आज की रात यह तय होता है कि इस साल किस-किसका अल्लाह के घर से बुलावा आयेगा और किस-किसको ज़िन्दगी मिलनी है। यानि मौत के ख़ौफ के साथ लोग अल्लाह की बारगाह में अपनी निजात की अर्ज़ी लगाते हैं।
इस दिन मस्जिदों में विशेष इबादतें होती हैं  तथा रात में शहर की प्रमुख मस्जिदों में शबे बारात की फजीलत के बारे में उलेमा ए दीन की  तकरीरें तथा खुसुसी दुआएँ भी होती हैं । इस मौके पर मुसलमान अपने रिश्तेदारों की कब्रों पर फातेहा भी पढ़ने जाते हैं।
शबे बारात की रात इबादत की रात है। लोग अल्लाह की बारगाह में अपने गुनाहों की तौबा करते हैं और अल्लाह से अपनी जानी-अनजानी ग़लतियों की म'आफी माँगते हैं।
 पन्द्र्ह शाबान को "शबे-बारात" मान कर जगह-जगह, चौराहों, गली-कूचों में मजलिसें जमातें और करके पन्द्र्ह शाबान की अहमियत और फ़ज़ीलत का बयान होता है.
मस्जिदों, खानकाहों वगैरा में जमा होकर या आमतौर से सलातुल उमरी सौ रकआत (उमरी सौ रकआत), नमाज़ सलाते रगाइब (रगाइब की नमाज़), सलातुल अलफ़िआ (हज़ारी नमाज़) की नमाज़ की जाती है.
यह भी होता है कि पन्द्रह शअबान की रात को "ईदुल अम्वात" (मुर्दों की ईद) समझ कर मुर्दों की रुहों का ज़मीन पर आने का इन्तिज़ार करते हैं।कई लोग  शबे-बारात के दिन मकानों की सफ़ाई, बर्तनों की धुलाई, नये-नये कपडों को पहनते हैं, औरतें तरह-तरह के पकवान मसलन हलवा, पूडी, मसूर की दाल पकाती और नगमें गा-गा कर रात भर जागती हैं।
कई लोग नियाज़ फ़ातिहा, कुरआन ख्वानी (कुरआन पढना), मज़ारों की धुलाई, कब्रों पर फ़ूल चढाना, गुलगुलों से मस्जिदों की ताकों को भरते हैं. कई लोग शबे बारात पर हलवा पकाते हैं. कहते है कि जंगे उहुद में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दांत टूट गया था तो आपने हलवा खाया था इसलिये आज के दिन हलवा खाना सुन्नत है। कहा जाता है कि एक बुज़ुर्ग उवैस करनी को जब मालुम हुआ कि आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का दांत-ए-मुबारक शहीद हो गया तो उन्होने अपने दातों को पत्थर से तोड डाला और फ़िर उन्होने हलवा खाया.
 कहा जाता है कि जिसका अज़ीज़ इस साल मर गया हो तो "अरफ़ा"करे यानी शबे-बारात से एक रोज़ पहले हलवा पकाकर नियाज़ फ़ातिहा दिला दें इस तरह इसका साल का नया मुर्दा बरसों पुराने मुर्दों में शामिल हो जायेगा।

भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना,

भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना,
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.

बन न सको भगवान अगर तुम, कम से कम इन्सान बनो,
नही कभी शैतान बनो तुम, नही कभी हैवान बनो.

सदाचार अपना न सको तो पापों मे पग ना धरना,
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.

सत्य वचन ना बोल सको तो झूठ कभी भी मत बोलो,
मौन रहो तो भी अच्छा है, कम से कम विष मत घोलो.

बोल यदि पहले तुम तोलो फ़िर मुंह को खोला करना.
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.

घर न किसी का बसा सको तो झोपडियां न ढहा देना,
मरहम पट्टी कर ना सको तो क्षार नमक न लगा देना.

दीपक बन कर जल ना सको तो अंधियारा भी मत करना,

पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.

Thursday, 5 May 2011

SMS

At 33 he quit smoking, Will Power.
At 43 he quit drinking, Will Power.
At 53 he quit Gambling, Will Power.
At 63 he quit Making Love, Power Failure.

--------------------------
A Hillarious Spelling Mistake..

Behind a Truck,
It Read..


Put Deeper
at
Night !!!

------------------------------------

Every nice friend is a glimpse of GOD. It s 1 of Lifes best blessings, A priceless gift that can never be bought,Sold or Forgotten.....

--------------------

Sharabi Bhakt:-Hey Bhagwan Kya Aap Meri Sharab Chhudwa Sakte Hai?
.
Bhagwan- Haa beta!
.
Bhakt-To Meri 40 Botal Police Station Me Zapt Hai Woh Chhudwa Do Plz..

----------------------------------

 Sardar to doctor:
When I sleep, monkeys
play football in my dreams.
Dr:No problem,
just take this medicine b4 sleep.
Sardar: Kal se khaonga aaj final hai.

-----------------------------------

Monday, 2 May 2011

Holy Qur'an; Check this out





Check this out,

Very interesting findings of  
Dr. Tariq Al Swaidan
might  grasp your attention:
Dr.Tarig Al Swaidan discovered some verses in the
Holy Qur'an
That mention one thing is equal to another,
I.e. men are equal to women.
Although this makes sense grammatically,
The astonishing fact is that the number of
Times the word man appears in
 the Holy Qur'an
Is 24 and number of times the word
Woman appears is also 24,
Therefore not only is this phrase correct in
The grammatical sense but also true mathematically,
I.e. 24 = 24.
Upon further analysis of various verses,
He discovered that this is consistent throughout the whole
Holy Qur'an
Where it says one thing is like another.
See below for astonishing result of
The words mentioned number of times in Arabic
Holy Qur'an
Dunia (one name for life) 115 .
Aakhirat (one name for the life after this world) 115
Malaika (Angels) 88 .
Shayteen (Satan) 88
Life 145 ...... Death 145
Benefit 50 . Corrupt 50
People 50 ... Messengers 50
Eblees (king of devils) 11 .
Seek refuge from Eblees 11
Museebah (calamity) 75 . Thanks ! 75
Spending (Sadaqah) 73 .
  Satisfaction 73
People who are mislead 17 .D Dead people 17
Muslimeen 41 .J Jihad 41
Gold 8 .E Easy life 8
Magic 60 .F Fitnah (dissuasion, misleading)! 60
Zakat (Taxes Muslims pay to the poor) 32 ....
Barakah (Increasing or blessings of wealth) 32
Mind 49 .N Noor 49
Tongue 25 .S Sermon 25
Desite 8 .F Fear 8
Speaking publicly 18 .P Publicising 18
Hardship 114 .... Patience 114
Muhammad 4 .S Sharee'ah ( Muhammad's teachings) 4
Man 24 . Woman 24
And amazingly enough have a look how many times
The following words appear:
Salat 5 , Month 12, Day 365 ,
Sea 32 , Land 13
Sea + land = 32 + 13= 45
Sea = 32/45*100q.=71.11111111%
Land = 13/45*100 = 28.88888889%
Sea + land  100.00%
Modern science has only recently proven that the water covers
71.111% of the
Earth, while the land covers 28.889%.
Is this a coincidence? Question is that
Who taught Prophet Muhammad (PBUH) all this?
Reply automatically comes in mind that
ALMIGHTY ALLAH
Taught him.
This as   the
Holy Qur'an
 Also tells us this.
Please pass this on to all your friends
Aayah 87 of Suraa (Chapter) Al-Anbia  ! < /P>
para 17 :
LA ILAHA ILA ANTA
SUBHANAKA INI KUNTU MINA ZALIMEEN.
During the next 60 seconds,
 Stop whatever you are doing,
And take this opportunity.
 (Literally, it is only 1 minute).
All you have to do is
The following:
PLEASE SEND THIS TO ALL THE PEOPLE YOU KNOW.

Please Remember in ur Prayers







Saturday, 9 April 2011

gud friend

A gud friend is Not easy to obtain..
Once obtained, Difficult to maintain..
Once lost, Impossible to regain..
Moral:-
Mujhe sambhaal ke rakho khush Naseebo. O:)

Thursday, 7 April 2011

Lok Pal Bill / Anna Hazare

 Lok Pal Bill

1.Who is Anna Hazare?

An ex-army man. Fought 1965 Indo-Pak War

2.What's so special about him?

He built a village Ralegaon Siddhi in Ahamad Nagar district, Maharashtra

3.This village is a self-sustained model village. Energy is produced in the village itself from solar power, biofuel and wind mills. In 1975, it used to be a poverty clad village. Now it is one of the richest village in India. It has become a model for self-sustained, eco-friendly & harmonic village.

4.Anna Hazare was awarded Padma Bhushan and is a known figure for his social activities.

5.He is supporting a cause, the amendment of a law to curb corruption in India.

6. How that can be possible?

He is advocating for a Bil, The Lok Pal Bill (The Citizen Ombudsman Bill), that will form an autonomous authority who will make politicians (ministers), beurocrats (IAS/IPS) accountable for their deeds.

8. It's an entirely new thing right..?

In 1972, the bill was proposed by then Law minister Mr. Shanti Bhushan. Since then it has been neglected by the politicians and some are trying to change the bill to suit thier theft (corruption).

7. Oh.. He is going on a hunger strike for that whole thing of passing a Bill ! How can that be possible in such a short span of time?

The first thing he is asking for is:

The govt should come forward and announce that the bill is going to be passed.

Next, they make a joint committee to DRAFT the LOK PAL BILL. 50% goverment participation and 50% public participation.Bcz u cant trust the govt entirely for making such a bill which does not suit them.

8.What will happen when this bill is passed?

A LokPal will be appointed at the centre. He will have an autonomous charge, say like the Election Commission of India. In each and every state, Lokayukta will be appointed.The job is to bring all alleged party to trial in case of corruptions within 1 year. Within 2 years, the guilty will be punished.

Pass this on n show ur support

Tuesday, 5 April 2011

Leave applications


Leave applications( This is a cracker Read It.)
 


The Leave Applications;)

·
Infosys, Bangalore : An employee applied for leave as follows:

"Since I have to go to my village to sell my land along with my wife, please sanction me one-week leave."



·
This is from Oracle Bangalore: >From an employee who was performing the "mundan" ceremony of his 10 year old son:

"as I want to shave my son's head, please leave me for two days.."



·
Another gem from CDAC. Leave-letter from an employee who was performing his daughter's wedding:
"as I am marrying my daughter, please grant a week's leave.."



·
From H.A.L. Administration Dept:
"As my mother-in-law has expired and I am only one responsible for it, please grant me 10 days leave."



·
Another employee applied for half day leave as follows:
"Since I've to go to the cremation ground at 10 o-clock and I may not return, please grant me half day casual leave"



·
An incident of a leave letter:
"I am suffering from fever, please declare one-day holiday."



·
A leave letter to the headmaster:
"As I am studying in this school I am suffering from headache. I request you to leave me today"



·
Another leave letter written to the headmaster:
"As my headache is paining, please grant me leave for the day."



·
Covering note:
"I am enclosed herewith..."



·
Another one:
"Dear Sir: with reference to the above, please refer to my below..."



·
Actual letter written for application of leave:
"My wife is suffering from sickness and as I am her only husband at home I may be granted leave".



·
Letter writing:-
"I am well here and hope you are also in the same well."



·
A candidate's job application:
"This has reference to your advertisement calling for a ' Typist and an Accountant - Male or Female'... As I am both(!! )for the past several years and I can handle both with good experience, I am applying for the post.