अमीन कुरेशी
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मेहनती मजदूरों की कमी
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-मनरेगा से सोयाबीन की कटाई पर असर
-मनरेगा में शामिल हो खेती के काम
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भारत के ७० प्रतिशत लोग गाँव में बसते हैं. गाँव के ये लोग काफी मेहनतकश माने जाते हैं लेकिन अब विभिन्न कारणों से ग्रामीण मजदूर औए किसान भी सुस्त होते जा रहे हैं. इसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ रहा है. इसके दो प्रमुख कारण सामने आये हैं. एक तो मनरेगा और दूसरा कारण शहरी निवेशक .
महात्मा गांधी नेशनल रुरल एम्प्लोयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) ने ग्रामीण मजदूरों को सुस्त बना दिया है. मनरेगा में मिलनेवाली १२० रूपए मजदूरी और काम नाम मात्र. लंच से पहले और लंच के बाद थोडा बहुत काम कर दिन पूरा हो जाता है. यही कारण है कि ये मजदूर अब खेती बड़ी के काम में किसानों के यहाँ मजदूरी नहीं करते है. इस समय मालवा में सोयाबीन की कटाई का सीज़न है. सोयबीन को पकने के बाद फ़ौरन काटना होता है अन्यथा उसकी फली तिड़ जाती है और दाना खेत में गिर जाता है. ऐसे में मजदूरों की डिमांड सबसे अधिक होती है. किसान १५० से २०० रु तक मजदूरी देने को तैयार होते हैं लेकिन मनरेगा में लगे और बिगड़े मजदूर फसल काटने को तैयार नहीं हैं. इसका असर आम किसानों पर हो रहा है. बड़े किसान अब पंजाब से हार्वेस्टर किराये पर लाने लगे हैं. इसलिए उनके खेतों की फसल फटाफट कट जाती है लेकिन आम किसान परेशान हो रहा है. हार्वेस्टर से कटी फसल में सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि भूसा पूरे खेत में बिखर जाता है और किसी काम का नहीं रहता है. इससे पशु आहार की कमी होती है.
खेती बाड़ी में हो रही मजदूरों की कमी पर हालही में उद्योग संगठन फिक्की ने भी आवाज़ उठाई है. फिक्की ने मनरेगा के उद्योग और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का सर्वेक्षण किया है। इस सर्वे में सुझाव दिया गया है कि जब खेती-बाड़ी का काम जोरों पर हो तो इसे बंद कर देना चाहिए। सरकार की प्रमुख ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा के कारण उद्योगों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इससे मजदूरी बढ़ रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
फिक्की ने कहा कि इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों में किए जाने वाले काम को भी मनरेगा के तहत शामिल किया जाना चाहिए। ये उन क्षेत्रों में विशेष तौर पर लाभकारी होगा जहां औद्योगिक गतिविधियां ज्यादा है।सर्वेक्षण में पाया गया है कि मजदूरी 10 फीसद से ज्यादा बढ़ी है। मजदूरी की कमी के कारण संभावित नुकसान भी 10 फीसद आंका गया है ।
इससे पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह सुझाते हुए पत्र लिखा है कि जब खेती का काम जोरों पर हो तो मनरेगा की योजना निलंबित कर देनी चाहिए। हालांकि ग्रामीण विकास मंत्रालय इन प्रस्तावों से इत्तफाक नहीं रखता।
केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने मनरेगा को कृषि से जोड़ने की बात कही थी लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है.
दूसरी तरफ बड़ी संख्या में शहरी निवेशक ग्रामीण इलाकों में ज़मीन खरीद रहे हैं. मुंह मांगी कीमत, धन के लालच, मजदूरों से परेशान, आपदा , बैंकों का क़र्ज़ अदि परेशानियों से तंग आ कर कई किसान इनके चंगुल में फंस कर भूमिहीन हो रहे हैं. कई शहरी निवेशक खरीदी गई ज़मीन को एन ए कराने के लिए पड़त रखते हैं . इससे अनाज के उत्पादन में कमी आ रही है.
शहरी निवेशकों द्वारा खरीदी गई ज़मीन, सेज़ के लिए भूमि अधिग्रहण, नुक्लियर पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण, महामार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण, नयी कालोनियों के लिए भूमि अधिग्रहण, मोबाईल टावरों के लिए भूमि अधिग्रहण और उद्दोग के लिए भूमि अधिग्रहण इत्यादि कारणों से देश में कृषि योग्य भूमि का रगबा लगातार कम होता जा रहा है और अनाज की मांग बढती जा रही है. माना जा रहा है कि 2051 तक कृषि योग्य भूमि का रगबा १५ प्रतिशत काम हो जायेगा और अनाज की मांग डबल हो जायेगी.
अब समय आगया है कि सरकार कृषि काम में मनरेगा को शामिल किया जाए. देहातों में मची ज़मीन की लूट को रोकी जाए. नयी योजनायें बंज़र भूमि पर कायम की जाएँ.
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मेहनती मजदूरों की कमी
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-मनरेगा से सोयाबीन की कटाई पर असर
-मनरेगा में शामिल हो खेती के काम
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भारत के ७० प्रतिशत लोग गाँव में बसते हैं. गाँव के ये लोग काफी मेहनतकश माने जाते हैं लेकिन अब विभिन्न कारणों से ग्रामीण मजदूर औए किसान भी सुस्त होते जा रहे हैं. इसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ रहा है. इसके दो प्रमुख कारण सामने आये हैं. एक तो मनरेगा और दूसरा कारण शहरी निवेशक .
महात्मा गांधी नेशनल रुरल एम्प्लोयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) ने ग्रामीण मजदूरों को सुस्त बना दिया है. मनरेगा में मिलनेवाली १२० रूपए मजदूरी और काम नाम मात्र. लंच से पहले और लंच के बाद थोडा बहुत काम कर दिन पूरा हो जाता है. यही कारण है कि ये मजदूर अब खेती बड़ी के काम में किसानों के यहाँ मजदूरी नहीं करते है. इस समय मालवा में सोयाबीन की कटाई का सीज़न है. सोयबीन को पकने के बाद फ़ौरन काटना होता है अन्यथा उसकी फली तिड़ जाती है और दाना खेत में गिर जाता है. ऐसे में मजदूरों की डिमांड सबसे अधिक होती है. किसान १५० से २०० रु तक मजदूरी देने को तैयार होते हैं लेकिन मनरेगा में लगे और बिगड़े मजदूर फसल काटने को तैयार नहीं हैं. इसका असर आम किसानों पर हो रहा है. बड़े किसान अब पंजाब से हार्वेस्टर किराये पर लाने लगे हैं. इसलिए उनके खेतों की फसल फटाफट कट जाती है लेकिन आम किसान परेशान हो रहा है. हार्वेस्टर से कटी फसल में सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि भूसा पूरे खेत में बिखर जाता है और किसी काम का नहीं रहता है. इससे पशु आहार की कमी होती है.
खेती बाड़ी में हो रही मजदूरों की कमी पर हालही में उद्योग संगठन फिक्की ने भी आवाज़ उठाई है. फिक्की ने मनरेगा के उद्योग और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का सर्वेक्षण किया है। इस सर्वे में सुझाव दिया गया है कि जब खेती-बाड़ी का काम जोरों पर हो तो इसे बंद कर देना चाहिए। सरकार की प्रमुख ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा के कारण उद्योगों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इससे मजदूरी बढ़ रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
फिक्की ने कहा कि इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों में किए जाने वाले काम को भी मनरेगा के तहत शामिल किया जाना चाहिए। ये उन क्षेत्रों में विशेष तौर पर लाभकारी होगा जहां औद्योगिक गतिविधियां ज्यादा है।सर्वेक्षण में पाया गया है कि मजदूरी 10 फीसद से ज्यादा बढ़ी है। मजदूरी की कमी के कारण संभावित नुकसान भी 10 फीसद आंका गया है ।
इससे पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह सुझाते हुए पत्र लिखा है कि जब खेती का काम जोरों पर हो तो मनरेगा की योजना निलंबित कर देनी चाहिए। हालांकि ग्रामीण विकास मंत्रालय इन प्रस्तावों से इत्तफाक नहीं रखता।
केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने मनरेगा को कृषि से जोड़ने की बात कही थी लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है.
दूसरी तरफ बड़ी संख्या में शहरी निवेशक ग्रामीण इलाकों में ज़मीन खरीद रहे हैं. मुंह मांगी कीमत, धन के लालच, मजदूरों से परेशान, आपदा , बैंकों का क़र्ज़ अदि परेशानियों से तंग आ कर कई किसान इनके चंगुल में फंस कर भूमिहीन हो रहे हैं. कई शहरी निवेशक खरीदी गई ज़मीन को एन ए कराने के लिए पड़त रखते हैं . इससे अनाज के उत्पादन में कमी आ रही है.
शहरी निवेशकों द्वारा खरीदी गई ज़मीन, सेज़ के लिए भूमि अधिग्रहण, नुक्लियर पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण, महामार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण, नयी कालोनियों के लिए भूमि अधिग्रहण, मोबाईल टावरों के लिए भूमि अधिग्रहण और उद्दोग के लिए भूमि अधिग्रहण इत्यादि कारणों से देश में कृषि योग्य भूमि का रगबा लगातार कम होता जा रहा है और अनाज की मांग बढती जा रही है. माना जा रहा है कि 2051 तक कृषि योग्य भूमि का रगबा १५ प्रतिशत काम हो जायेगा और अनाज की मांग डबल हो जायेगी.
अब समय आगया है कि सरकार कृषि काम में मनरेगा को शामिल किया जाए. देहातों में मची ज़मीन की लूट को रोकी जाए. नयी योजनायें बंज़र भूमि पर कायम की जाएँ.