Monday, 10 October 2011

मेहनती मजदूरों की कमी

अमीन कुरेशी
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मेहनती मजदूरों की कमी
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-मनरेगा से सोयाबीन की कटाई पर असर
-मनरेगा में शामिल हो खेती के काम
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भारत के ७० प्रतिशत लोग गाँव में बसते हैं. गाँव के ये लोग काफी मेहनतकश माने जाते हैं लेकिन अब विभिन्न कारणों से ग्रामीण मजदूर औए किसान भी सुस्त होते जा रहे हैं. इसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ रहा है. इसके दो प्रमुख कारण सामने आये हैं. एक तो मनरेगा और दूसरा कारण शहरी निवेशक .

महात्मा गांधी नेशनल रुरल एम्प्लोयमेंट गारंटी एक्ट  (मनरेगा)  ने ग्रामीण मजदूरों को सुस्त बना दिया है. मनरेगा में मिलनेवाली १२० रूपए मजदूरी और काम नाम मात्र. लंच से पहले और लंच  के बाद थोडा बहुत काम कर दिन पूरा हो जाता है. यही कारण है कि ये मजदूर अब खेती बड़ी के काम में किसानों के यहाँ मजदूरी नहीं करते है. इस समय मालवा में सोयाबीन की कटाई का सीज़न है. सोयबीन को पकने के बाद फ़ौरन काटना होता है अन्यथा उसकी फली तिड़ जाती है और दाना खेत में गिर जाता है. ऐसे में मजदूरों की डिमांड सबसे अधिक होती है. किसान १५० से २०० रु तक मजदूरी देने को तैयार होते हैं लेकिन मनरेगा में लगे और बिगड़े मजदूर फसल काटने को तैयार नहीं हैं. इसका असर आम  किसानों पर हो रहा है. बड़े  किसान अब पंजाब से हार्वेस्टर किराये पर लाने लगे हैं. इसलिए उनके खेतों की फसल फटाफट कट जाती है लेकिन आम किसान परेशान हो रहा है. हार्वेस्टर से कटी फसल में सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि भूसा पूरे खेत में बिखर जाता है और किसी काम का नहीं रहता है. इससे पशु आहार की कमी होती है.

खेती बाड़ी  में हो रही मजदूरों की कमी पर हालही में उद्योग संगठन फिक्की ने भी आवाज़ उठाई है. फिक्की ने मनरेगा के उद्योग और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले असर का सर्वेक्षण किया है। इस सर्वे में सुझाव दिया गया है कि जब खेती-बाड़ी का काम जोरों पर हो तो इसे बंद कर देना चाहिए। सरकार की प्रमुख ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा के कारण उद्योगों को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इससे मजदूरी बढ़ रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है।
फिक्की ने कहा कि इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों में किए जाने वाले काम को भी मनरेगा के तहत शामिल किया जाना चाहिए। ये उन क्षेत्रों में विशेष तौर पर लाभकारी होगा जहां औद्योगिक गतिविधियां ज्यादा है।सर्वेक्षण में पाया गया है कि मजदूरी 10 फीसद से ज्यादा बढ़ी है। मजदूरी की कमी के कारण संभावित नुकसान भी 10 फीसद आंका गया है ।
इससे पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह सुझाते हुए पत्र लिखा है कि जब खेती का काम जोरों पर हो तो मनरेगा की योजना निलंबित कर देनी चाहिए। हालांकि ग्रामीण विकास मंत्रालय इन प्रस्तावों से इत्तफाक नहीं रखता।
केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने मनरेगा को कृषि से जोड़ने की बात कही थी लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है.
दूसरी तरफ बड़ी संख्या में शहरी निवेशक ग्रामीण इलाकों में ज़मीन खरीद रहे हैं. मुंह मांगी कीमत, धन के लालच, मजदूरों से परेशान, आपदा , बैंकों का क़र्ज़ अदि परेशानियों से तंग आ कर कई किसान इनके चंगुल में फंस कर भूमिहीन हो रहे हैं. कई शहरी निवेशक खरीदी गई ज़मीन को एन ए कराने के लिए पड़त रखते हैं . इससे अनाज के उत्पादन में कमी आ रही है.

शहरी निवेशकों द्वारा  खरीदी गई ज़मीन, सेज़ के लिए भूमि अधिग्रहण, नुक्लियर पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण, महामार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण, नयी कालोनियों के लिए भूमि अधिग्रहण, मोबाईल टावरों के लिए भूमि अधिग्रहण और उद्दोग के लिए भूमि अधिग्रहण इत्यादि कारणों से देश में कृषि योग्य भूमि का रगबा लगातार कम होता जा रहा है और अनाज की मांग बढती जा रही है. माना जा रहा है कि 2051 तक कृषि योग्य भूमि का रगबा १५ प्रतिशत काम हो जायेगा और अनाज की मांग डबल हो जायेगी.

अब समय आगया है कि सरकार कृषि काम में मनरेगा को शामिल किया जाए. देहातों में मची ज़मीन की लूट को रोकी  जाए. नयी योजनायें बंज़र भूमि पर कायम की जाएँ.

भारत और चीन के बीच बढ़ी सुपर पावर की दौड़

अमीन कुरेशी
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भारत और चीन  के बीच बढ़ी  सुपर पावर की दौड़
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-अमेरिका में आर्थिक मंदी और आन्दोलन.
-अमेरिका में पूंजीवादी नीतियां हुईं नाकाम.
-भारत को पूंजीवाद पर  विचार करने की ज़रुरत.
-अमेरिका में आर्थिक विकास की दर 2.3 प्रतिशत.
-भरत कि आर्थिक विकास दर ८-९ फीसदी.
-चीन की विकास दर १०  फीसदी.
-डॉलर से अधिक चीनी मुद्रा रेनमिनबी की मांग.
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अमेरिका में दो साल पहले शुरू हुई मंदी वहां के बड़े बैंकों की गलत नीतियों का अंजाम थी. अमरीका में जनता आर्थिक संकट और बेरोज़गारी में वृद्धि का ज़िम्मेदार, अमरीकी बैंकरों को मानती  है. अमेरिकी समाज में लोगों की आमदनियों में बढ़ते फासले और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. पूंजीवाद के नये पैंतरे के रूप में भूमंडलीकरण को आये हुये महज दो ही दशक हुये हैं कि ये स्थिति आ गयी. कभी न कभी पूंजीवाद के खिलाफ लोग लामबंद होंगे, यह तय था, लेकिन इतनी जल्दी होंगे, यह पता नहीं था. तो  क्या अब अमेरिकी पूंजीवादी नीतियां उसके लिए अब खतरनाक साबित हो रही हैं? क्या अमेरिका इस संकट से आसानी से निकल पाएगा? या अब भारत और चीन एक  नयी विश्व शक्ति के रूप में उभरेंगे.
हाल के घटनाक्रमों के मद्देनज़र अब विश्व स्तर पर यह माना जा रहा है कि अमेरिका का राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव अगले दो वर्षों में काफी कम हो जाएगा और वर्ष 2025 तक वह एकमात्र सुपरपॉवर का दर्जा खो देगा. ब्रिटेन के शीर्ष खुफिया संगठन ने अपनी रिपोर्ट में इस बात के संकेत देते हुए कहा है कि इस दौरान चीन और भारत अमेरिका  को प्रभुत्व के मामले में कड़ी प्रतिस्पर्धा देते हुए उसके साथ शीर्ष पर आ जाएँगे. राष्ट्रीय खुफिया परिषद ने अपनी इस रिपोर्ट में वर्ष 2025 को लक्ष्य बनाकर दुनियाभर में शक्ति संतुलन के रुझान का विश्लेषण किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान परमाणु हथियारों का उपयोग काफी बढ़ने की संभावना है.
अपना पद छोड़ते समय अमेरिका के रक्षा मंत्री रॉबर्ट्स गेट्स ने यह आशंका व्यक्त करते हुए कहा था कि देश में चल रहे जबर्दस्त आर्थिक संकट के मद्देनजर, अमेरिका को विश्व के दूसरे देशों को लेकर अपनी नीतियों में फेरबदल करना पड़ा है. उन्होंने कहा कि उनके पद छोड़ने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि वे ऐसी किसी सरकार का हिस्सा नहीं बने रहना चाहते, जो कमजोर हो।गेट्स ने कहा कि उन्होंने अधिकांश समय अमेरिकी सरकार के साथ काम करते हुए निकाला है और अमेरिका को सुपर पॉवर बनाए रखने के लिए काफी मेहनत भी की है. लेकिन अब समय बदल रहा है. उन्होंने साफ कहा कि यह उनके पद छोड़ने का प्रमुख कारण है.
 अमेरिका के वाणिज्य मंत्रालय ने बिगड़ती अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सीधे विदेशी निवेश पर जोर दिया है.अमेरिका के शीर्ष उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपने देश में भारत, चीन और ब्राजील से और निवेश का आह्वान किया ताकि अमेरिका में रोजगार के और अवसर पैदा किए जा सकें। जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी के अध्यक्ष और मुख्य कार्याधिकारी जेफ्री इमेल्ट ने कहा कि चीन, भारत, ब्राजील जैसी जगहों, जहां अभी लोगों के पास पैसा है, से हमारे यहां सीधा निवेश नाममात्र को है और कोई वजह नहीं है कि ये देश अमेरिका में उससे ज्यादा निवेश नहीं कर सकते जितना कि वे अभी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि मुझे पूरा भरोसा है कि यदि हमारे यहां भारत, चीन और अन्य जगहों से ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होता है तो हमारे यहां उतनी समस्या नहीं होगी जितनी अभी है.
 भरत कि आर्थिक विकास दर ८-९ फीसदी है. चीन की विकास दर भी पिछले तीन दशकों से लगातार 10 फीसदी से ज्यादा है. अर्थशास्त्रियों के लिए ये किसी पहेली से कम नहीं है. अमेरिकी करेंसी डॉलर के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है और विशेषज्ञों का मानना है कि रिजर्व करेंसी के रूप में इसके दिन पूरे हो गए हैं. अब चीन की मुद्रा रेनमिनबी (आरएनबी) का ज़माना आ रहा है.चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत होने का असर उसकी करेंसी पर साफ दिख रहा है. इसकी मांग और ताकत दोनों ही बढ़ी है. इसका विश्व अर्थव्यवस्था में रोल बढ़ता ही जा रहा है और संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह डॉलर की जगह ले लेगी. 

एक तरफ भारत और चीन की  विकास दर बढ़ रही है तो दूसरी तरफ अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था बुरी तरह से चरमरा रही है. अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था केवल 1.8 फीसदी की दर से बढ़ रही है, याने करीब-करीब स्थिर है.अमेरिका में आर्थिक विकास की दर 2011 में 2.3 प्रतिशत होने का अनुमान है, जबकि 2010 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2.9 प्रतिशत थी. प्रति परिवार संपत्ति की कीमत में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है. उपभोक्ताओं की सामान खरीदने की क्षमता में गिरावट आ रही है. मकानों की कीमतें गिर रही हैं और नौकरियों का संकट है. और तो और अब डॉलर की पूछ भी काम हो रही है. रिजर्व करेंसी के रूप में इसके दिन पूरे हो गए हैं. अब चीन की मुद्रा रेनमिनबी (आरएनबी) का ज़माना आ रहा है. अब भारत और चीन के सुपर पावर बनने के संकेंत प्रबल होते जा रहे हैं.

अमेरिका के इन हालातों के बाद अब  चीन और भारत के बीच आर्थिक सुपरपॉवर बनने की होड़ जारी है.  चीन आधिकारिक तौर पर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है.मंदी को ठेंगा दिखाकर भारत तेजी से आगे दौड़ रहा है औए इस मंदी में सबसे मज़बूत आधार हमारा कृषि सेक्टर है. हमारे कमज़ोर सेक्टर हैं भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, प्रांतवाद और पूंजीवाद. अमेरिका में पूंजीवादी नीतियां नाकाम होने के बाद अब  डॉ मनमोहन सिंह और डॉ मोंटेकसिंह अहलुवालिया जैसे पूंजीवादी लीडरों को सबक लेना चाहिए.

Thursday, 6 October 2011

♦ स्‍टीव जॉब्‍स;-व्‍याख्‍यान

भूखें रहें | मासूम रहें | जिज्ञासु रहें | गलतियां करें… ♦ स्‍टीव जॉब्‍स

एपल के जरिये दुनिया को तकनीकी उद्यमिता का सबसे चमकदार चश्‍मा दिखाने वाले स्‍टीव जॉब्‍स अब हमारे बीच नहीं हैं। छह साल पहले स्‍टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच उन्‍होंने एक व्‍याख्‍यान दिया था। वह व्‍याख्‍यान जिंदगी और जज्‍बा के बीच एक बेहद मजबूत पुल की तरह है।
मुझे गर्व है कि मैं आपके साथ हूं, आपकी दीक्षा के दिन। दुनिया के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक में। सच कहूं तो, मैंने कभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी ही नहीं की। कॉलेज के दीक्षांत समारोह के इतना नजदीक मैं पहले नहीं गया। आज मैं आपको अपने जीवन की तीन कहानियां सुनाऊंगा। बस इतना ही, कुछ खास नहीं। महज तीन कहानियां।
पहली कहानी है, बिंदुओं को जोड़ कर देखने के बारे में। रीड कॉलेज को अपने पहले ही छह महीनों में मैंने छोड़ दिया, मगर मैं वहीं पड़ा रहा, अगले करीब 18 महीनों तक, उसे पूरी तरह छोड़ने के पहले। तो आखिर मैंने बीच में ही ये क्यों छोड़ा? ये मेरे जन्म से जुड़ी बात है। मेरी असली मां एक युवा, अविवाहित स्नातक छात्र थीं, और उन्होंने फैसला लिया मुझे गोद देने का। वो इस बात पर अड़ी थीं कि मुझे गोद लेने वाले स्नातक पढ़े-लिखे लोग हों, तो सारा इंतजाम पुख्ता था कि मुझे जन्म लेते ही एक वकील और उनकी पत्नी अपना लेंगे। बस गड़बड़़ इतनी ही हुई कि जब मैं प्रकट हुआ तो उन्होंने ये फैसला लिया कि उन्हें तो एक लड़की चाहिए। तो मेरे अभिभावकों को, जो कि वेट-लिस्ट में थे, रात में ही फोन कर के पूछा गया : “हमारे पास एक नवजात नर शिशु है – क्या आप उसे गोद लेंगे?” उन्होंने कहा : “क्यों नहीं”। मेरी असली मां को बाद में पता चला कि मेरी मां ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं की थी। उन्होंने गोद देने के कागजातों पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कई महीनों बाद इसकी इजाजत दी, जब मेरे माता-पिता ने वादा किया कि मुझे कॉलेज भेजा ही जाएगा। ये मेरे जीवन की शुरुआत थी। और करीब 17 साल बाद, मैं वास्तव में कॉलेज गया। मगर बड़ी मासूमियत से मैंने ऐसा कॉलेज चुना, जो लगभग स्टेनफोर्ड जितना महंगा था, और मेरे कामगार माता-पिता की सारी गाढ़ी कमाई मेरे कॉलेज की फीस में जा रही थी।
छह महीने बीतने पर, मुझे लगा कि इस शिक्षा से खास फायदा नहीं है। मुझे कुछ नहीं पता था कि मैं अपने जीवन के साथ क्या करूंगा और ये भी नही पता था कि ये जानने में कॉलेज कैसे मेरी मदद करेगा। और उसके बावजूद भी मैं, अपने माता-पिता के जीवन भर की कमाई लुटा रहा था। तो मैंने कॉलेज छोड़ने का फैसला लिया और विश्वास किया कि सब ठीक हो जाएगा। उस समय ये डरावना फैसला था, मगर पलट कर देखने से लगता है ये मेरे द्वारा लिये गये सबसे बेहतरीन फैसलों में था।
जिस क्षण मैंने कॉलेज छोड़ा, मैंने उन क्लासों में जाना बंद कर दिया जिनमें मेरी कोई रुचि नहीं थी, और उन सब क्लासों में बैठने लगा, जो मुझे रुचिकर लगती थीं।
ये उतना भी हसीन सफर नहीं था। मेरे पास हॉस्‍टल में कमरा नहीं था, तो मैं दोस्तों के कमरों में फर्श पर सोता था, कोक की खाली बोतलें 5 पैसे में वापस कर के, उससे खाना खरीदता था, और हर रविवार की रात को 7 मील पैदल चलकर हरे-कृष्ण मंदिर में हफ्ते में एक बार ढंग का खाना खाता था।
मुझे ये बहुत अच्छा लगता था। और जो भी मैंने सिर्फ अपनी जिज्ञासा और रुचि के लिए सीखा, वो बाद में जा कर अमूल्य सिद्ध हुआ। चलिए, आपको एक उदाहरण देता हूं…
रीड कॉलेज में उस समय शायद पूरे देश का सबसे अच्छा सुलेख (कैलिग्राफी) कोर्स चलता था। सारे कैंपस में हर पोस्टर, हर खांचे पर लगा हर लेबल बेहतरीन तरीके से हाथ से सुलेखित था। क्योंकि मैं पढ़ाई छोड़ चुका था, और मुझ पर क्लास जाने का दबाव नहीं था, मैंने फैसला किया कि मैं इस कोर्स के जरिये सुलेख लिखना सीखूंगा। मैंने सेंस और सेंस-सेरिफ आदि टाइपफेस सीखे, और अलग-अलग अक्षरों के बीच जगह को बढ़ाना और घटाना सीखा, और कैसे अच्छा सुलेख और टाइपोग्राफी अच्छी बनती है, ये सीखा। वो सुंदर था, ऐतिहासिक था और कलात्मकता से ऐसे ओत-प्रोत जो विज्ञान नहीं समझा सकता, और मैंने स्वयं को उससे बंधा पाया। और इस सब से कभी भी मेरे जीवन में काम आने की कोई आशा नहीं थी। मगर दस साल बाद, जब हम अपना पहला मैकिन्‍टोष कंप्‍यूटर बना रहे थे, वो सब मेरे काम आया। और हमने वो सारी बाते मैक में निहित कर दीं। ये पहला ऐसा कंप्‍यूटर था, जिसमें सुंदर टाइपोग्राफी थी। यदि मैंने वो एक कोर्स अपने कॉलेज में नहीं किया होता, तो मैक में कभी भी तमाम टाइप-फेस और अनुपात में सजे सुंदर फोंट नहीं होते। और क्योंकि विन्डोज ने मैक की नकल ही की है, ये संभव है कि कभी पीसी पर भी वो नहीं ही होते। यदि मैंने कॉलेज बीच में नहीं छोड़ा होता, तो कभी भी मैं सुलेख की उस क्लास में नहीं जा पाया होता, और पर्सनल कंप्‍यूटर में शायद ये रोचक टाइपोग्राफी नहीं होती, जो आपको दिखती है।
जाहिर है जब मैं कॉलेज में था, इन बिंदुओं को जोड़ कर देख पाना असंभव था। लेकिन वो साफ-साफ समझ आ रहा था, उस समय के दस साल बाद।
देखिए, आप भविष्य में जुड़ने वाले बिंदुओं को नहीं जोड़ पाएंगे लेकिन मुड़ कर देखने पर आप उन्हें आसानी से जोड़ सकते हैं। लिहाजा आपको ये विश्वास रखना होगा कि भविष्य में ये बिंदु कैसे न कैसे जुड़ ही जाएंगे। आपको किसी चीज में विश्वास रखना होगा – चाहे उसे अंदर की आवाज कहें, तकदीर कहें, जीवन, कर्म, जो भी कहें। क्योंकि ये मान कर चलना कि ये बिंदु जुड़ेंगे, आपको अपने दिल को काम करने का आत्म-विश्वास देगा। तब भी जब कि आप सबसे अलग रास्ते पर जाएं। और यही आपके जीवन में फर्क लाएगा।
मेरी दूसरी कहानी है प्रेम और क्षति के बारे में। मैं बहुत नसीबवाला था – मुझे जल्दी पता लग गया कि मैं क्या करना चाहता था। वोज और मैंने एप्पल की शुरुआत अपने माता-पिता के गैरिज से की थी, जब मैं 20 साल का था। हमने मेहनत की, और दस साल में एप्पल सिर्फ हम दोनों की कंपनी, जो एक गैरिज में थी, से बढ़ कर 2 बिलियन डॉलर और 4000 कर्मचारियों की हो गयी थी। सिर्फ एक साल पहले ही हमने अपना सबसे अच्छा उत्पाद – मैकिन्टोष – निकाला था, और मैं तुरंत ही 30 वर्ष का हुआ था…
…और फिर मुझे कंपनी से निकाल फेंका गया।
आप उस कंपनी से कैसे निकाले जा सकते हैं, जो आपने शुरू की हो? हुआ ये था कि एप्पल की बढ़त के साथ हमने किसी को कंपनी में रखा था, ये सोच कर कि वो बहुत होनहार है। करीब एक साल तक सब कुछ ठीक चला। पर उसके बाद भविष्य की हमारी योजनाओं में फर्क आने लगा और हम एक दूसरे से पूर्णतः असहमत हो गये। जब ऐसा हुआ, तो हमारे निदेशकों के बोर्ड ने उसका साथ दिया।
मैं तीस साल का था और कंपनी से बाहर था। और बहुत ही शोर-शराबे के साथ बाहर। मेरे वयस्‍क जीवन का एकमात्र केंद्र-बिंदु मेरे जीवन से बाहर था, और ये मेरे लिए सदमा था। मुझे अगले कुछ महीनों तक तो समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूं। मुझे लगा कि मैंने उद्यमियों की पीढ़ियों को शर्मसार कर दिया है। कि जैसे ही रिले-रेस का डंडा मेरे हाथ आया, मैंने उसे गिरा दिया। मैं डेविड पकार्ड (एचपी के संस्थापक) और बॉब नोयेस से मिला और इतने खराब प्रदर्शन के लिए माफी मांगी। मेरी असफलता जग-जाहिर हो गयी थी। मैं बदनाम था। मुझे लगा कि मैं सिलिकोन-वैली से भाग जाऊं…
…मगर धीरे-धीरे मेरे अंदर एक बीज स्फुटित हुआ। मैं अब भी उसे प्यार करता था, जो मैं करता था। एप्पल में हुए घटनाक्रम ने मेरे और मेरे काम के बीच के लगाव को जरा भी कम नहीं किया था। मेरा तिरस्कार किया गया था, मगर अब भी मुझे इश्क था। और मैंने फैसला किया कि मैं फिर से शुरुआत करूंगा।
मैं तब ये नहीं देख पा रहा था, मगर एप्पल से निकाल दिये जाने से अच्छा मेरे जीवन में आज तक कुछ हुआ ही नहीं। सफलता में चूर होने के भारी-भरकम बोझ की जगह नौसिखिया होने की ताजगी ने ले ली थी, हर बात के बारे में कम सुनिश्चितता। इसने मुझे मेरे जीवन के सबसे रचनात्मक दौर में प्रवेश दिया। अगले पांच साल में, मैंने “नेक्स्ट” नाम की कंपनी शुरू की, फिर एक और “पिक्सार” नाम की कंपनी, और मुझे उस औरत से इश्क भी हुआ, जो बाद में मेरी पत्नी बनने वाली थी। पिक्सार ने कंप्‍यूटर पर रची गयी विश्व की पहली कार्टून फिल्म बनायी – टॉय स्टोरी, और आज वो विश्व की सबसे सफल कंप्‍यूटर एनिमेशन की कंपनी है। आश्चर्यजनक घटनाक्रम में, एप्पल ने नेक्स्ट को खरीद लिया, और मैं वापस एप्पल आ गया, और जो तकनीकें हमनें नेक्स्ट में विकसित की थीं, वो एप्पल के दुबारा जीवंत होने के लिए जिम्मेदार हैं। और लौरीन और मेरे पास एक सुंदर सुखी परिवार है।
मेरा यकीन है कि ऐसा कुछ न हुआ होता, यदि मैं एप्पल से निकाला न गया होता।
दवा का स्वाद अत्यंत कड़वा था, मगर शायद मरीज को उसकी निहायत जरूरत थी। कभी-कभी जीवन आपके सर को चट्टानों तले कुचलता है। उस समय अपना विश्वास मत छोड़िए। मैं आश्वस्त हूं कि केवल एक कारण से मैंने हार नहीं मानी – ये कि मुझे अपने काम से प्यार था। आपको ढूंढ़़ना होगा कि आप किसे प्यार करते हैं। ये बात आपके काम और आपके प्रेमियों पर बराबर लागू होती है। आपका काम आपके जीवन का एक बड़ा हिस्सा होगा, और इसलिए संतुष्ट रहने का एकमात्र तरीका है वो करना, जो आपको महान काम लगता हो। और महान काम करने का एकमात्र तरीका है, वो करना जिस से आपको प्रेम हो। यदि वो आपको अभी तक नहीं मिला है, तो ढूंढ़ते रहिए। ठहरिए मत। आशा मत छोड़िए। दिल के बाकी मामलों की तरह, आपको पता लग जाएगा जब वो आपको मिलेगा। और किसी भी महान दोस्ती की तरह, साल दर साल ये और बेहतर और बेहतर होता जाता है। तो ढूंढ़िए जब तक वो आपको न मिले। ठहरिए मत।
मेरी तीसरी कहानी है, मृत्यु के बारे में। जब मैं 17 साल का था, तो मैंने कह ये सूत्र पढ़ा था : “यदि हर दिन को जीवन के आखिरी दिन मान कर जियोगे, तो एक दिन जरूर तुम सही होगे।” उसने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी… और तब से, पिछले 33 साल से, मैंने हर सुबह खुद को शीशे में देख कर पूछा है : “अगर ये मेरे जीवन का आखिरी दिन हो, तो क्या मैं वही करना चाहूंगा, जो मैं आज करने जा रहा हूं?” और जब भी लगातार कई दिनों तक इसका नकारात्मक जवाब मिलता है, मुझे पता लग जाता है कि कुछ बदलना जरूरी है। ये याद रखना कि मैं जल्द ही मर जाऊंगा, सबसे महत्वपूर्ण तरीका है जीवन के बड़े फैसले लेने का। क्योंकि लगभग सब कुछ – आपसे की जाने वाली आशाएं, सारा गर्व, असफलता का सारा डर, शर्मिंदगी से भय … ये सब मृत्यु के सामने बेमानी हो जाता है, और वही बचता है जो सबसे जरूरी है। ये याद रखना कि कि आपको एक दिन मरना ही होगा, सबसे अच्छा तरीका है जो मुझे पता है इस सोच द्वारा छले जाने का कि आप के पास खोने को कुछ है। दरअसल, आप तो पहले ही नंगे हैं। कोई कारण ही नहीं है अपने दिल की बात नहीं मानने का।
करीब एक साल पहले पता लगा कि मुझे कैंसर है। सुबह 7:30 पर एक जांच हुई, और उसने मेरी पाचक-ग्रंथि में एक ट्यूमर दिखाया। मुझे तो ये तक नहीं पता था कि पाचक-ग्रंथि होती क्या है। डॉक्टरों ने मुझे बताया कि इस तरह के कैंसर का कोई इलाज नहीं है, और मैं ज्यादा से ज्यादा तीन से छह महीने जीवित रहूंगा। मेरे डॉक्टर ने मुझे घर जा कर अपने काम-काज ठीक करने को कहा, जिसका मतलब है – मरने के लिए तैयार हो जाओ। इसका मतलब है कि कोशिश करो अपने बच्‍चों को वो सब बताने की, जो आप अगले दस साल में बताना चाहता थे, अब सिर्फ कुछ महीनों में ही। इस का मतलब है कि वो सब काम कर डालो, जिससे कि आपके परिवार को आपकी मृत्यु से कम-से-कम कष्ट हो। इसका मतलब है अलविदा कह लो।
मैं सारे दिन इस फैसले के साथ ही जिया। उस शाम को मेरी बायोप्सी हुई, और उन्होंने एक एन्डोस्कोप मेरे गले में उतारा, मेरे पेट से होते हुए, मेरी आंतों में, और मेरी पाचक-ग्रंथि के ट्यूमर में से कुछ सेल निकाले। मुझे बेहोश कर दिया गया था, मगर मेरी पत्नी, जो वहां थीं, ने मुझे बताया कि जब उन्होंने सूक्ष्म-दर्शी से उन सेलों को देखा, तो डॉक्टरों को रोना आ गया क्योंकि मेरा कैंसर पाचक-ग्रंथि के उन गिने-चुने कैंसरों में से था, जिसका इलाज संभव था। मेरी शल्य-क्रिया हुई, और भाग्य से, मैं अब ठीक हूं। मृत्यु के इतने करीब मैं कभी नहीं गया, और मैं चाहता भी नहीं अगले कुछ दशकों तक मैं और करीब जाऊं।
इस आपदा को झेल कर मैं आज आपसे और भी निश्चितता से कह सकता हूं कि मृत्यु एक उपयोगी मगर केवल सुनने में अच्छा लगने वाली संरचना है : कोई भी मरना नहीं चाहता। यहां तक कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, लेकिन वहां जाने के लिए मरना नहीं चाहते। और इसके बावजूद, मृत्यु हम सबकी साझी मंजिल है। कभी भी कोई भी इस से बच नहीं सका है। और ये ठीक भी है, क्योंकि मृत्यु शायद जीवन का महानतम अविष्कार है। ये जीवन का बदलाव लाने वाला मुनीम है। ये प्राचीन को हटा कर नवीन के लिए जगह बनाता है। इस समय आप ही नवीन हैं, मगर जल्द ही एक दिन आएगा, जब आप प्राचीन होंगे और आपको हटा दिया जाएगा।
इतनी नाटकीयता के लिए माफी चाहता हूं, मगर ये शाश्वत सत्य है। आपका जीवनकाल सीमित है; उसे दूसरे किसी की जिंदगी जीने में व्यर्थ न कीजिए। सिद्धांतों में मत फंसिए – जो कि दूसरों की सोच का निष्‍कर्ष है। दूसरों के मतों के शोर द्वारा अपनी अंदरूनी आवाज का कत्ल मत होने दीजिए। और सबसे जरूरी, अपने दिल और अपने मन की बात करने की हिम्मत रखिए। दिल और मन को पता होता है कि आप सच में क्या बनना चाहते हैं। बाकी सब द्वितीय है।
जब मैं युवा था, द होल अर्थ कैटालाग नाम का एक प्रकाशन होता था, जो कि मेरी पीढ़ी के लिए बाइबल जैसा था। उसे स्टीवार्ट ब्रांड नाम के एक व्यक्ति ने बनाया था, यहीं पास में ही – मैनलो पार्क में, और उसने अपने काव्यात्मक अंदाज से इसमें जान फूंक दी थी। ये 60 के दशक के अंत में हुआ था, पर्सनल कंप्‍यूटर वगैरह आने के पहले, और इसे टाइपराइटरों, कैंचियों और पोलारायड कैमरों की मदद से रचा गया था। ये गूगल के पेपरबैक रूप की तरह था, गूगल के आने के करीब 35 साल पहले : ये आदर्शवादी था, और पटा पड़ा था जादुई तरीकों, और महान आइडियों से। स्टीवार्ट और उसकी टीम ने द होल अर्थ कैटालाग के कई संस्करण निकाले, और फिर जब वक्त आ गया, तो उसका एक आखिरी संस्करण निकाला। ये सत्तर के दशक के बीच हुआ, और मैं आपकी ही उम्र का था। उस आखिरी संस्करण के पीछे गांव की एक सड़क की सुबह ली गयी तस्वीर थी, जैसी सड़क पर आप स्वयं को पाएंगे यदि आप बहुत उत्साही हों। उसके नीचे ये शब्द लिखे थे : “भूखे रहें। मासूम रहें।” (Stay Hungry… Stay Foolish… जिज्ञासु रहें, गलतियां करें।) जाते जाते वो ये ही विदाई – संदेश दे कर गये थे। भूखे रहें। मासूम रहें। और मैं अपने लिए सिर्फ यही दुआ करता हूं। और आपके दीक्षांत समारोह पर, मैं आपके लिए भी यही दुआ करता हूं। भूखे रहें। मासूम रहें। (जिज्ञासु रहें। गलतियां करें।)
आप सब का बहुत धन्यवाद।

अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे

पहले तहरीर स्क्वायर, फिर रामलीला और अब वॉल स्ट्रीट
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अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे  
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अमीन कुरेशी
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फरवरी  2011 में  काहिरा के तहरीर स्क्वायर में 12 दिन के शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने मिस्र में 30 साल से राज कर रहे हुस्नी  मुबारक की सत्ता पलट दी. इस प्रदर्शन के बाद दुनिया के कई देशों में अलग अलग मुद्दों को लेकर आन्दोलन शुरू है. भ्रष्टाचार को लेकर हमारे देश में  भी अन्ना हजारे का दिल्ली के रामलीला मैदान पर ऐतिहासिक अनशन हुआ. आन्दोलन की यह हवा अब अमेरिका तक पहुँच गई है.
कारपोरेट लूट के कारण बेरोजगारी, आर्थिक संकट एवं अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव बरते जाने जैसे कई मुद्दों को लेकर वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो के आह्वान के साथ सैकड़ों लोगों का जारी विरोध-प्रदर्शन देश भर में फैल गया है।
न्यूयार्क से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शनों का दौर बोस्टन, शिकागो, सन फ्रांसिस्को होता हुआ देश भर में फैल गया है। मैनहट्टन में कुछ प्रदर्शनकारियों ने  अपने चेहरे पर सफेद रंग पोत कर मार्च निकाला। वहीं शिकागो में प्रदर्शनकारियों ने ड्रम पीटकर विरोध जताया। बोस्टन, सेंट लुइस, केंसास, लास एंजिल्स और अन्य शहरों में प्रदर्शनकारियों ने विरोधस्वरूप रास्ते से गुजर रहे वाहनों को झंडे-बैनर दिखाए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया।
नित नए संगठनों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ने के कारण प्रदर्शन और व्यापक होते जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी लोगों को इससे जोड़ने के लिये वेबसाइटों एवं वीडियो का सहारा ले रहे हैं। गौरतलब है कि यह विरोध प्रदर्शन गत 17 सितंबर को शुरू हुआ था जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने न्यूयार्क शेयर बाजार के सामने तंबू गाड़ने की कोशिश की थी। इसके बाद सैकड़ों लोगों ने निकटवर्ती पार्क में शिविर बना लिए और संगठित रूप से विरोध शुरू कर दिया।
उन्होंने न सिर्फ चिकित्सा सुविधाओं और कानूनी सहायता का इंतजाम किया बल्कि आक्युपाय वाल स्ट्रीट जर्नल के नाम से अपना अखबार निकालना भी शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया और लोगों को तितर बितर करने के लिए उन पर काली मिर्च का छिड़काव किया।
पुलिस ने स्थानीय ब्रुकलिन ब्रिज से करीब 700 लोगों को बिना इजाजत मार्च निकालने और ट्रैफिक व्यवस्था ठप करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने ब्रुकलिन ब्रिज को यातायात के लिए पुन: खोल दिया।
अमरीका में वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो आंदोलन अन्य पश्चिमी देशों तक पहुंच गया है। आस्ट्रेलिया में लोगों ने मेलबर्न पर अधिकार करो के नारे के साथ  मेलबर्न में व्यापक प्रदर्शन की घोषणा की है। इसी प्रकार सिडनी पर अधिकार करो के नारे के साथ  सिडनी में भी प्रदर्शन की घोषणा की गयी है। यह ऐसी स्थिति में है कि अमरीका के विभिन्न नगरों में "वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो" आंदोलन जारी है।
 न्यूयार्क, शिकागो, बोस्टन, लास एंजिल्स आदि महत्वपूर्ण अमेरिकी शहरों में बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. लोग पूरी तैयारियों के साथ विरोध प्रदर्शन के लिये जुटे हैं. ठंढ से बचाव के लिये गर्म कपडे, किताबें, दवाइयां, खाने-पीने की दूसरी चीजों से लैस होकर लोग प्रदर्शन के लिये आए हैं. विरोध की गंभीरता और सघनता का पता इसी से चलता है कि वे शायद पूरे जाडे के मौसम तक टिकने का बंदोबस्त किये बैठे हैं.
 अमेरिका में भारतियों की हालत भी ठीक नही है. ओबामा ने आउट सोर्सिंग पर रोक लगा कर उन कंपनियों पर अतिरिक्त कर लगा दिया है जो एशिया के लोगों को नौकरी दे रही हैं. आपको याद होगा कुछ दिन पहले ओबामा ने अमेरिका से कहा था कि भरतीय बच्चों से सावधान रहें, क्यों कि उनका गणित और भौतिक शास्त्र पक्का होता है. कहने का अर्थ था भारतीय अमेरिका में कब्ज़ा जमाते जा रहे है.
अमेरिका में दो साल पहले शुरू हुई मंदी वहां के बड़े बैंकों की गलत नीतियों का अंजाम थीं। अमरीका में जनता आर्थिक संकट और बेरोज़गारी में वृद्धि का ज़िम्मेदार, अमरीकी बैंकरों को मानती  है।  मुहिम में शामिल लोग अमेरिकी समाज में लोगों की आमदनियों में बढ़ते फासले और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार पूंजीपतियों के हितों का ज्यादा ध्यान रख रही है। कुछ जगहों पर इसे पूंजीवादी व्यवस्था के विरोधियों का एक गठबंधन भी बताया जा रहा है। कई मज़दूर संगठनों ने इस मुहिम को अपना समर्थन देने की घोषणा की है.

पूंजीवाद के नये पैंतरे के रूप में भूमंडलीकरण को आये हुये महज दो ही दशक हुये हैं कि ये स्थिति आ गयी. कभी न कभी पूंजीवाद के खिलाफ लोग लामबंद होंगे, यह तय था, लेकिन इतनी जल्दी होंगे, यह पता नहीं था. तो  
 क्या अब अमेरिकी की पूंजीवादी नीतियां उसके लिए अब खतरनाक साबित हो रही हैं? क्या अमेरिका इस संकट से आसानी से निकल पाएगा? क्या अमेरिका की मुश्किलों का असर दूसरे देशों पर पड़ेगा? हालांकि इसे मिस्र के तहरीर चौराहे जैसी क्रांति नहीं मानी जा रही है लेकिन अमरीकी पूंजीवाद के केंद्र - वॉल स्ट्रीट पर हो रहा ये प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि आर्थिक मंदी किस तरह अमरीका में बदलाव ला रही  है.

हल ही में अन्ना के आन्दोलन में अमेरिका ने भारत को संयम बरतने की सीख दी थी. जिसका भारत ने यह कहकर विरोध किया था कि अमेरिका देश के अंदरूनी मामलों में दखल न दे. अब अमेरिका को अन्य देशों के मामलों  को छोडकर अपने मामले सुलझाने चाहिए. अन्य देशों को मानवाधिकारों की रक्षा और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर ध्यान देने का उपदेश देने वाली अमरीकी सरकार, "वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो" आंदोलन के प्रदर्शनकारियों का खुद दमन कर रही है।