Tuesday, 20 March 2012

बीजेपी अब करे दो प्रयोग

अमीन कुरेशी

-टाइम पत्रिका ने मोदी पर लगाया ठप्पा

-क्या  बीजेपी  और एनडीए  को स्वीकार हैं मोदी

-बीजेपी मोदी को प्रधान मंत्री के तौर पर करे पेश

-मुसलमान और सभी को साथ लेकर करे दूसरा प्रयोग


हमारे देश से अग्रेज चले गए लेकिन विलायत का भूत अब तक नहीं उतरा है. विलायती अर्थात विदेश की चीजों से लगाव , फिर चाहे वह किसी पत्रिका में छपा लेख ही क्यों न हो. हाल ही में टाइम पत्रिका ने नरेंद्र मोदी पर एक कवर स्टोरी छापी है. इस लेख को दुनिया की शीर्ष अदालत के फैसले की तरह पेश किया जा रहा है. मोदी को किसी पत्रिका से अधिक देश के लोगों द्वारा स्वीकार करने की कसौटी पर खरा उतरने की ज़रुरत है. यह अलग बात है कि खुद बीजेपी में मोदी को लेकर अलग अलग राय हैं. एन डी ए को मोदी स्वीकार नहीं हैं. पहले बिहार और फिर उ प्र के चुनाव से मोदी को दूर रखा गया. बीजेपी को डर है कि मोदी के नाम से एन डी ए बिखर सकता है और उसके घटक दल तीसरा मोर्चा मज़बूत कर सकते हैं. अकेले बीजेपी को लोकसभा का चुनाव अपने दम पर  जीतने की आश उ प्र चुनाव के बाद औए काम हो गयी है. लेकिन बीजेपी को अब दो प्रयोग कर के देख लेना चाहिए. एक तो संघ की इच्छा अनुसार मोदी को प्रधान मंत्री के तौर पर पेश कर अकेले उनके दम पर चुनाव लड़ना चहिये. यदि सफलता न मिले तो अगला चुनाव मुसलमान और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर लड़ के देखना चाहिए. सफलता मिल सकती है.

टाइम पत्रिका का मानना है कि नरेंद्र मोदी ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी को चुनौती दे सकते हैं. टाइम ने अपने ताजा अंक में नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में खूब कसीदे काढ़े हैं. टाइम ने कहा है कि 2014 के आम चुनावों में अभी दो साल बचे हैं, जिसके बीच कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि सोनिया के पुत्र राहुल पार्टी में नई जान फूंकेंगे, लेकिन हाल के विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद वो कमजोर नजर आ रहे हैं.

टाइम पत्रिका के नये अंक में आवरण पर नरेन्द्र मोदी की गंभीर मुद्रा वाली एक बड़ी तस्वीर छापी गई है, जिसके साथ शीर्षक लिखा गया है- मोदी के इरादे पक्के हैं. लेकिन क्या वो भारत का नेतृत्व कर सकते हैं?
टाइम की संवाददाता ज्योति थोटम के एक लेख में कहा गया है कि इकसठ साल के मोदी शायद एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी पिछली उपलब्धियाँ और व्यापक पहचान के बल पर राहुल को चुनौती दे सकते हैं.
गुजरात दंगों को लेकर कहा गया है कि इस संदर्भ में मोदी का नाम मात्र लिए जाने से, जिनका नाम अमिट तौर पर साल 2002 के गुजरात दंगो से जुड़ा है, भारत का एक वर्ग वितृष्णा से भर उठता है. उन्हें देश का नेता चुने जाने का मतलब होगा भारत का राजनीतिक क्षेत्र में धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का त्याग करना.

लेकिन टाइम इन सब के बाद भी मोदी को विकास पुरुष की श्रेणी में खड़े करने से परहेज नहीं करता. पत्रिका के अनुसार- एक वर्ग जब किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचता है जो देश को भ्रष्टाचार के दलदल और निकम्मेपन के शाप से उबार सकता है, जो दृढ़ निश्चय और काम से काम रखने वाला एक ऐसा नेता हो जो देश को विकास की उस राह पर अग्रसर कर सके जहां वो चीन की बराबरी कर सकता है तो मोदी का नाम सामने आता है.

 कांग्रेस ने  टाइम पत्रिका और बुक्रलिन संस्थान द्वारा प्रकाशित लेखों में मोदी की प्रशंसा की आलोचना करते हुए कहा कि इन लेखों में गुजरात के विकास से जुड़े झूठे तथ्यों को शामिल किया गया है। पत्रकारिता और रिपोर्टिंग संतुलित और निष्पक्ष होनी चाहिए।  इनमें सिर्फ उन्हीं लोगों के कथन क्यों शामिल किए गए जिन्होंने मोदी की तारीफ की। ये लेख पक्षपातपूर्ण हैं और इसलिए ये गुजरात और देश के लोगों के साथ नाइंसाफी है। कांग्रेस की टिप्पणी में कहा गया कि इस पत्रिका में ओसामा बिन लाडेन और ईराक के पूर्व तानाशाह सद्दाम हुसैन के बारे में भी छप चुका है।

मोदी पर छापे जाने का विरोध विदेशों में भी जारी है। इंडियन  अमेरिकेन  मुस्लिम  कौंसिल   (आईएएमसी) का आरोप है कि गुजरात के सीएम को मैगजीन के कवर पेज पर जगह दिलाने के लिए वॉशिंग्‍टन की एक पीआर एजेंसी का सहारा लिया गया है। यह संगठन मोदी को टाइम के कवर पेज पर जगह मिलने के खिलाफ है और दुनियाभर में इसके खिलाफ अभियान चला रहा है।

 आईएएमसी का आरोप है कि वॉशिंग्‍टन की पीआर एजेन्सी एपीसीओ वर्ल्‍डवाइड के प्रयासों से ही ‘टाईम’ में मोदी की वाहवाही हुई है। अमेरिका ने अभी तक नरेन्‍द्र मोदी को वीजा नहीं दिया है और हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने मोदी की आलोचना की थी, ऐसे वक्त में ‘टाईम’ में मोदी की प्रशंसा की रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है।

आईएएमसी का  कहना है, 'टाइम की कवर स्‍टोरी में कई गलत और झूठी बातें प्रकाशित हुई हैं। इसमें बतौर सीएम नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की कई गलतियों को छिपाने की कोशिश की गई है।'

गुजरात सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर राज्य की छवि को बेहतर बनाने के लिये एपीसीओ वर्ल्ड वाइड की सेवा ली है। यह एजेंसी अमेरिका की दूसरे नंबर की सबसे पावरफुल पीआर एजेंसी है। गुजरात में विपक्ष के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने आरोप लगाया है कि गुजरात के लोगों के पैसे से ‘टाइम’ में मोदी की खबर छपी है। यह पीआर एजेंसीअमेरिका का मशहूर लॉबिइंग फर्म है। इसके सदस्‍यों में अमेरिका के पूर्व सीनेटर और राजदूत शामिल हैं। इसके क्लाइन्ट में मलेशिया सरकार, रूस के पूर्व कम्युनिस्ट नेता मिखाईल खोद्रोवस्की जैसी हस्तियां हैं।
 एपीसीओ वर्ल्ड वाइड जैसी लॉबिइंग फर्म बिना पैसा लिए कोई काम नहीं करती है. टाइम की कवर स्‍टोरी से मोदी पर फिर उँगलियाँ उठने लगीं हैं.

Tuesday, 13 March 2012

बहनजी का एम डी मसाला मिक्स

-अमीन कुरेशी-
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-मुसलमानों के लिए उम्मीद की 3 किरण.
-चुनाव के बाद कांग्रेस की खुली ऑंखें.
-तीसरे मोर्चे ने फिर बदली करवट .
-शरद पवार भी बदल सकते हैं पाला.
-संकट में कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दल
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उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राजनीति ने जो करवट बदली है उससे न सिर्फ समाजवाद की नयी बयार आयी है अपितु तीसरे मोर्चे ने फिर करवट बदली है. उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद देशभर के और खास कार उत्तर प्रदेश के मुसलमाओं को नयी उम्मीद जगी है. यह उम्मीद तीन तरफ़ा दिखाई दे रही है. एक तो वादे के अनुसार सपा सरकार मुसलमानों के विकास के लिए ठोंस कदम उठाएगी. दूसरी उम्मीद बहनजी मायावती ने जगानी शुरू की हैं और तीसरी उम्मीद अब केंद्र में कांग्रेस सरकार से की जा सकती है.

बहनजी ने चुनाव के बाद दो बड़े सिग्नल दिए हैं जिससे लगता है कि वे अब दलित-मुस्लिम की नयी सोशल इंजीनियरिंग करेंगी. दिल्ली कूच करने से पहले बहनजी ने उ प्र बसपा की कमान  नसीम सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या को सौंप दी. इसी के तहत विधान परिषद में सिद्दीकी और विधानसभा में मौर्या को बीएसपी की कमान सौंपी गई है। यूपी विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद मायावती ने  पार्टी के एमएलए, एमपी और कोर्डिनेटरों के साथ बैठक की। बैठक में हार की समीक्षा हुई और भविष्य की रणनीति के बारे में चिंतन हुआ। मायावती ने कोर्डिनेटरों से हार का फीडबैक लेने के बाद सभी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में अभी से जुटने को कहा ।

सुश्री मायावती ने दूसरा संकेत राज्यसभा के लिए अपना नामाकन दाखिल करते समय दिया है.बसपा ने उत्तर प्रदेश के पूर्व केबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को राज्य सभा में भेजने से साफतौर पर इंकार कर दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि बसपा किसी धन्नासेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी, बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। मायावती के इस आश्वासन के बाद कहा जा रहा है कि मायावती और मुनकाद अली ही राज्यसभा जाएंगे।

कभी बसपा विधायक अपनी ही सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे, उन्हीं विधायकों ने शशांक शेखर सिंह को राज्यसभा में भेजे जाने का खुलकर विरोध किया। अर्थात हारने के बाद पार्टी को समझ आयी है कि  तिलक-तराजू-और तलवार के वोट नहीं मिले हैं.इसलिए बहनजी ने अब तैयार किया है एम डी मसाला, अर्थात मुस्लिम-दलित (ओबीसी) कॉम्बिनेशन.

उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद अब सम्भावना है कि कांग्रेस सरकार भी रंगनाथ मिश्र आयोग और सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पर से धूल झाडे और मुसलमानों के विकास के लिए डेढ़ साल में कुछ कर दिखाए. उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों ने यह संकेत दे दिए हैं वे अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं. कम से कम जहाँ विकल्प है वहां तो नहीं हैं. जहाँ विकल्प नहीं है वहां सिर्फ इसलिए कांग्रेस को वोट मिल सकते हैं कि कहीं साम्प्रदायिक दल जीत न जाय. इस तरह की  मजबूरी अब सिर्फ एम पी, राजस्थान, गुजरात औए महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ही बची है. देश के अन्य राज्यों में रीजनल पार्टियाँ मजबूत हैं. महाराष्ट्र में भी शरद पवार लोकसभा चुनाव के समय तीसरे मोर्चे में शामिल हो कर विकल्प दे सकते हैं. मजबूत रीजनल पार्टियाँ न सिर्फ कांग्रेस बल्कि बीजेपी के लिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि दोनों राष्ट्रीय दलों का बोरिया बिस्तर ये मजबूत रीजनल पार्टियाँ तीसरा मोर्चा बना कर करसकती हैं. अधिकतर रीजनल दल न सिर्फ सेकुलारिज़म कि पैरोकार हैं अपितु समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की पौषक हैं. ये दल कई वर्षों से सबको साथ लेकर अपने अपने राज्यों में राज कर रहे हैं.