Thursday, 6 October 2011

अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे

पहले तहरीर स्क्वायर, फिर रामलीला और अब वॉल स्ट्रीट
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अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे  
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अमीन कुरेशी
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फरवरी  2011 में  काहिरा के तहरीर स्क्वायर में 12 दिन के शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने मिस्र में 30 साल से राज कर रहे हुस्नी  मुबारक की सत्ता पलट दी. इस प्रदर्शन के बाद दुनिया के कई देशों में अलग अलग मुद्दों को लेकर आन्दोलन शुरू है. भ्रष्टाचार को लेकर हमारे देश में  भी अन्ना हजारे का दिल्ली के रामलीला मैदान पर ऐतिहासिक अनशन हुआ. आन्दोलन की यह हवा अब अमेरिका तक पहुँच गई है.
कारपोरेट लूट के कारण बेरोजगारी, आर्थिक संकट एवं अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव बरते जाने जैसे कई मुद्दों को लेकर वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो के आह्वान के साथ सैकड़ों लोगों का जारी विरोध-प्रदर्शन देश भर में फैल गया है।
न्यूयार्क से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शनों का दौर बोस्टन, शिकागो, सन फ्रांसिस्को होता हुआ देश भर में फैल गया है। मैनहट्टन में कुछ प्रदर्शनकारियों ने  अपने चेहरे पर सफेद रंग पोत कर मार्च निकाला। वहीं शिकागो में प्रदर्शनकारियों ने ड्रम पीटकर विरोध जताया। बोस्टन, सेंट लुइस, केंसास, लास एंजिल्स और अन्य शहरों में प्रदर्शनकारियों ने विरोधस्वरूप रास्ते से गुजर रहे वाहनों को झंडे-बैनर दिखाए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया।
नित नए संगठनों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ने के कारण प्रदर्शन और व्यापक होते जा रहे हैं। प्रदर्शनकारी लोगों को इससे जोड़ने के लिये वेबसाइटों एवं वीडियो का सहारा ले रहे हैं। गौरतलब है कि यह विरोध प्रदर्शन गत 17 सितंबर को शुरू हुआ था जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने न्यूयार्क शेयर बाजार के सामने तंबू गाड़ने की कोशिश की थी। इसके बाद सैकड़ों लोगों ने निकटवर्ती पार्क में शिविर बना लिए और संगठित रूप से विरोध शुरू कर दिया।
उन्होंने न सिर्फ चिकित्सा सुविधाओं और कानूनी सहायता का इंतजाम किया बल्कि आक्युपाय वाल स्ट्रीट जर्नल के नाम से अपना अखबार निकालना भी शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया और लोगों को तितर बितर करने के लिए उन पर काली मिर्च का छिड़काव किया।
पुलिस ने स्थानीय ब्रुकलिन ब्रिज से करीब 700 लोगों को बिना इजाजत मार्च निकालने और ट्रैफिक व्यवस्था ठप करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने ब्रुकलिन ब्रिज को यातायात के लिए पुन: खोल दिया।
अमरीका में वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो आंदोलन अन्य पश्चिमी देशों तक पहुंच गया है। आस्ट्रेलिया में लोगों ने मेलबर्न पर अधिकार करो के नारे के साथ  मेलबर्न में व्यापक प्रदर्शन की घोषणा की है। इसी प्रकार सिडनी पर अधिकार करो के नारे के साथ  सिडनी में भी प्रदर्शन की घोषणा की गयी है। यह ऐसी स्थिति में है कि अमरीका के विभिन्न नगरों में "वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो" आंदोलन जारी है।
 न्यूयार्क, शिकागो, बोस्टन, लास एंजिल्स आदि महत्वपूर्ण अमेरिकी शहरों में बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. लोग पूरी तैयारियों के साथ विरोध प्रदर्शन के लिये जुटे हैं. ठंढ से बचाव के लिये गर्म कपडे, किताबें, दवाइयां, खाने-पीने की दूसरी चीजों से लैस होकर लोग प्रदर्शन के लिये आए हैं. विरोध की गंभीरता और सघनता का पता इसी से चलता है कि वे शायद पूरे जाडे के मौसम तक टिकने का बंदोबस्त किये बैठे हैं.
 अमेरिका में भारतियों की हालत भी ठीक नही है. ओबामा ने आउट सोर्सिंग पर रोक लगा कर उन कंपनियों पर अतिरिक्त कर लगा दिया है जो एशिया के लोगों को नौकरी दे रही हैं. आपको याद होगा कुछ दिन पहले ओबामा ने अमेरिका से कहा था कि भरतीय बच्चों से सावधान रहें, क्यों कि उनका गणित और भौतिक शास्त्र पक्का होता है. कहने का अर्थ था भारतीय अमेरिका में कब्ज़ा जमाते जा रहे है.
अमेरिका में दो साल पहले शुरू हुई मंदी वहां के बड़े बैंकों की गलत नीतियों का अंजाम थीं। अमरीका में जनता आर्थिक संकट और बेरोज़गारी में वृद्धि का ज़िम्मेदार, अमरीकी बैंकरों को मानती  है।  मुहिम में शामिल लोग अमेरिकी समाज में लोगों की आमदनियों में बढ़ते फासले और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार पूंजीपतियों के हितों का ज्यादा ध्यान रख रही है। कुछ जगहों पर इसे पूंजीवादी व्यवस्था के विरोधियों का एक गठबंधन भी बताया जा रहा है। कई मज़दूर संगठनों ने इस मुहिम को अपना समर्थन देने की घोषणा की है.

पूंजीवाद के नये पैंतरे के रूप में भूमंडलीकरण को आये हुये महज दो ही दशक हुये हैं कि ये स्थिति आ गयी. कभी न कभी पूंजीवाद के खिलाफ लोग लामबंद होंगे, यह तय था, लेकिन इतनी जल्दी होंगे, यह पता नहीं था. तो  
 क्या अब अमेरिकी की पूंजीवादी नीतियां उसके लिए अब खतरनाक साबित हो रही हैं? क्या अमेरिका इस संकट से आसानी से निकल पाएगा? क्या अमेरिका की मुश्किलों का असर दूसरे देशों पर पड़ेगा? हालांकि इसे मिस्र के तहरीर चौराहे जैसी क्रांति नहीं मानी जा रही है लेकिन अमरीकी पूंजीवाद के केंद्र - वॉल स्ट्रीट पर हो रहा ये प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि आर्थिक मंदी किस तरह अमरीका में बदलाव ला रही  है.

हल ही में अन्ना के आन्दोलन में अमेरिका ने भारत को संयम बरतने की सीख दी थी. जिसका भारत ने यह कहकर विरोध किया था कि अमेरिका देश के अंदरूनी मामलों में दखल न दे. अब अमेरिका को अन्य देशों के मामलों  को छोडकर अपने मामले सुलझाने चाहिए. अन्य देशों को मानवाधिकारों की रक्षा और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर ध्यान देने का उपदेश देने वाली अमरीकी सरकार, "वॉल स्ट्रीट पर अधिकार करो" आंदोलन के प्रदर्शनकारियों का खुद दमन कर रही है।

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