-अमीन कुरेशी-
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-मुसलमानों के लिए उम्मीद की 3 किरण.
-चुनाव के बाद कांग्रेस की खुली ऑंखें.
-तीसरे मोर्चे ने फिर बदली करवट .
-शरद पवार भी बदल सकते हैं पाला.
-संकट में कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दल
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उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राजनीति ने जो करवट बदली है उससे न सिर्फ समाजवाद की नयी बयार आयी है अपितु तीसरे मोर्चे ने फिर करवट बदली है. उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद देशभर के और खास कार उत्तर प्रदेश के मुसलमाओं को नयी उम्मीद जगी है. यह उम्मीद तीन तरफ़ा दिखाई दे रही है. एक तो वादे के अनुसार सपा सरकार मुसलमानों के विकास के लिए ठोंस कदम उठाएगी. दूसरी उम्मीद बहनजी मायावती ने जगानी शुरू की हैं और तीसरी उम्मीद अब केंद्र में कांग्रेस सरकार से की जा सकती है.
बहनजी ने चुनाव के बाद दो बड़े सिग्नल दिए हैं जिससे लगता है कि वे अब दलित-मुस्लिम की नयी सोशल इंजीनियरिंग करेंगी. दिल्ली कूच करने से पहले बहनजी ने उ प्र बसपा की कमान नसीम सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या को सौंप दी. इसी के तहत विधान परिषद में सिद्दीकी और विधानसभा में मौर्या को बीएसपी की कमान सौंपी गई है। यूपी विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद मायावती ने पार्टी के एमएलए, एमपी और कोर्डिनेटरों के साथ बैठक की। बैठक में हार की समीक्षा हुई और भविष्य की रणनीति के बारे में चिंतन हुआ। मायावती ने कोर्डिनेटरों से हार का फीडबैक लेने के बाद सभी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में अभी से जुटने को कहा ।
सुश्री मायावती ने दूसरा संकेत राज्यसभा के लिए अपना नामाकन दाखिल करते समय दिया है.बसपा ने उत्तर प्रदेश के पूर्व केबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को राज्य सभा में भेजने से साफतौर पर इंकार कर दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि बसपा किसी धन्नासेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी, बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। मायावती के इस आश्वासन के बाद कहा जा रहा है कि मायावती और मुनकाद अली ही राज्यसभा जाएंगे।
कभी बसपा विधायक अपनी ही सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे, उन्हीं विधायकों ने शशांक शेखर सिंह को राज्यसभा में भेजे जाने का खुलकर विरोध किया। अर्थात हारने के बाद पार्टी को समझ आयी है कि तिलक-तराजू-और तलवार के वोट नहीं मिले हैं.इसलिए बहनजी ने अब तैयार किया है एम डी मसाला, अर्थात मुस्लिम-दलित (ओबीसी) कॉम्बिनेशन.
उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद अब सम्भावना है कि कांग्रेस सरकार भी रंगनाथ मिश्र आयोग और सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पर से धूल झाडे और मुसलमानों के विकास के लिए डेढ़ साल में कुछ कर दिखाए. उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों ने यह संकेत दे दिए हैं वे अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं. कम से कम जहाँ विकल्प है वहां तो नहीं हैं. जहाँ विकल्प नहीं है वहां सिर्फ इसलिए कांग्रेस को वोट मिल सकते हैं कि कहीं साम्प्रदायिक दल जीत न जाय. इस तरह की मजबूरी अब सिर्फ एम पी, राजस्थान, गुजरात औए महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ही बची है. देश के अन्य राज्यों में रीजनल पार्टियाँ मजबूत हैं. महाराष्ट्र में भी शरद पवार लोकसभा चुनाव के समय तीसरे मोर्चे में शामिल हो कर विकल्प दे सकते हैं. मजबूत रीजनल पार्टियाँ न सिर्फ कांग्रेस बल्कि बीजेपी के लिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि दोनों राष्ट्रीय दलों का बोरिया बिस्तर ये मजबूत रीजनल पार्टियाँ तीसरा मोर्चा बना कर करसकती हैं. अधिकतर रीजनल दल न सिर्फ सेकुलारिज़म कि पैरोकार हैं अपितु समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की पौषक हैं. ये दल कई वर्षों से सबको साथ लेकर अपने अपने राज्यों में राज कर रहे हैं.
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-मुसलमानों के लिए उम्मीद की 3 किरण.
-चुनाव के बाद कांग्रेस की खुली ऑंखें.
-तीसरे मोर्चे ने फिर बदली करवट .
-शरद पवार भी बदल सकते हैं पाला.
-संकट में कांग्रेस और बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दल
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उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राजनीति ने जो करवट बदली है उससे न सिर्फ समाजवाद की नयी बयार आयी है अपितु तीसरे मोर्चे ने फिर करवट बदली है. उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद देशभर के और खास कार उत्तर प्रदेश के मुसलमाओं को नयी उम्मीद जगी है. यह उम्मीद तीन तरफ़ा दिखाई दे रही है. एक तो वादे के अनुसार सपा सरकार मुसलमानों के विकास के लिए ठोंस कदम उठाएगी. दूसरी उम्मीद बहनजी मायावती ने जगानी शुरू की हैं और तीसरी उम्मीद अब केंद्र में कांग्रेस सरकार से की जा सकती है.
बहनजी ने चुनाव के बाद दो बड़े सिग्नल दिए हैं जिससे लगता है कि वे अब दलित-मुस्लिम की नयी सोशल इंजीनियरिंग करेंगी. दिल्ली कूच करने से पहले बहनजी ने उ प्र बसपा की कमान नसीम सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या को सौंप दी. इसी के तहत विधान परिषद में सिद्दीकी और विधानसभा में मौर्या को बीएसपी की कमान सौंपी गई है। यूपी विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद मायावती ने पार्टी के एमएलए, एमपी और कोर्डिनेटरों के साथ बैठक की। बैठक में हार की समीक्षा हुई और भविष्य की रणनीति के बारे में चिंतन हुआ। मायावती ने कोर्डिनेटरों से हार का फीडबैक लेने के बाद सभी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी में अभी से जुटने को कहा ।
सुश्री मायावती ने दूसरा संकेत राज्यसभा के लिए अपना नामाकन दाखिल करते समय दिया है.बसपा ने उत्तर प्रदेश के पूर्व केबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को राज्य सभा में भेजने से साफतौर पर इंकार कर दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि बसपा किसी धन्नासेठ और नौकरशाह को राज्यसभा भेजने की पहल नहीं करेगी, बल्कि मुस्लिम समाज या ओबीसी के किसी व्यक्ति को राज्यसभा भेजेगी। मायावती के इस आश्वासन के बाद कहा जा रहा है कि मायावती और मुनकाद अली ही राज्यसभा जाएंगे।
कभी बसपा विधायक अपनी ही सरकार में कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे, उन्हीं विधायकों ने शशांक शेखर सिंह को राज्यसभा में भेजे जाने का खुलकर विरोध किया। अर्थात हारने के बाद पार्टी को समझ आयी है कि तिलक-तराजू-और तलवार के वोट नहीं मिले हैं.इसलिए बहनजी ने अब तैयार किया है एम डी मसाला, अर्थात मुस्लिम-दलित (ओबीसी) कॉम्बिनेशन.
उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद अब सम्भावना है कि कांग्रेस सरकार भी रंगनाथ मिश्र आयोग और सच्चर कमिटी की रिपोर्ट पर से धूल झाडे और मुसलमानों के विकास के लिए डेढ़ साल में कुछ कर दिखाए. उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुसलमानों ने यह संकेत दे दिए हैं वे अब कांग्रेस के साथ नहीं हैं. कम से कम जहाँ विकल्प है वहां तो नहीं हैं. जहाँ विकल्प नहीं है वहां सिर्फ इसलिए कांग्रेस को वोट मिल सकते हैं कि कहीं साम्प्रदायिक दल जीत न जाय. इस तरह की मजबूरी अब सिर्फ एम पी, राजस्थान, गुजरात औए महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ही बची है. देश के अन्य राज्यों में रीजनल पार्टियाँ मजबूत हैं. महाराष्ट्र में भी शरद पवार लोकसभा चुनाव के समय तीसरे मोर्चे में शामिल हो कर विकल्प दे सकते हैं. मजबूत रीजनल पार्टियाँ न सिर्फ कांग्रेस बल्कि बीजेपी के लिए भी चिंता का विषय हैं क्योंकि दोनों राष्ट्रीय दलों का बोरिया बिस्तर ये मजबूत रीजनल पार्टियाँ तीसरा मोर्चा बना कर करसकती हैं. अधिकतर रीजनल दल न सिर्फ सेकुलारिज़म कि पैरोकार हैं अपितु समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा की पौषक हैं. ये दल कई वर्षों से सबको साथ लेकर अपने अपने राज्यों में राज कर रहे हैं.
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