Sunday, 3 July 2011

शबे बारात

शबे बारात यानी मुक्ति की रात
रमजान उल मुबारक के 15 दिन पूर्व मनाया जाने वाला विशेष इबादत का त्योहार है शबे बारात. शब का अर्थ है रात और बारात या बराअत का अर्थ है मुक्ति या निजात. अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की बारगाह में शबे बारात की रात हर इंसान की ऑडिट रिपोर्ट तैयार होती है। जिसमें उनके भले-बुरे कामों का लेखा-जोखा होता है। आज की रात यह तय होता है कि इस साल किस-किसका अल्लाह के घर से बुलावा आयेगा और किस-किसको ज़िन्दगी मिलनी है। यानि मौत के ख़ौफ के साथ लोग अल्लाह की बारगाह में अपनी निजात की अर्ज़ी लगाते हैं।
इस दिन मस्जिदों में विशेष इबादतें होती हैं  तथा रात में शहर की प्रमुख मस्जिदों में शबे बारात की फजीलत के बारे में उलेमा ए दीन की  तकरीरें तथा खुसुसी दुआएँ भी होती हैं । इस मौके पर मुसलमान अपने रिश्तेदारों की कब्रों पर फातेहा भी पढ़ने जाते हैं।
शबे बारात की रात इबादत की रात है। लोग अल्लाह की बारगाह में अपने गुनाहों की तौबा करते हैं और अल्लाह से अपनी जानी-अनजानी ग़लतियों की म'आफी माँगते हैं।
 पन्द्र्ह शाबान को "शबे-बारात" मान कर जगह-जगह, चौराहों, गली-कूचों में मजलिसें जमातें और करके पन्द्र्ह शाबान की अहमियत और फ़ज़ीलत का बयान होता है.
मस्जिदों, खानकाहों वगैरा में जमा होकर या आमतौर से सलातुल उमरी सौ रकआत (उमरी सौ रकआत), नमाज़ सलाते रगाइब (रगाइब की नमाज़), सलातुल अलफ़िआ (हज़ारी नमाज़) की नमाज़ की जाती है.
यह भी होता है कि पन्द्रह शअबान की रात को "ईदुल अम्वात" (मुर्दों की ईद) समझ कर मुर्दों की रुहों का ज़मीन पर आने का इन्तिज़ार करते हैं।कई लोग  शबे-बारात के दिन मकानों की सफ़ाई, बर्तनों की धुलाई, नये-नये कपडों को पहनते हैं, औरतें तरह-तरह के पकवान मसलन हलवा, पूडी, मसूर की दाल पकाती और नगमें गा-गा कर रात भर जागती हैं।
कई लोग नियाज़ फ़ातिहा, कुरआन ख्वानी (कुरआन पढना), मज़ारों की धुलाई, कब्रों पर फ़ूल चढाना, गुलगुलों से मस्जिदों की ताकों को भरते हैं. कई लोग शबे बारात पर हलवा पकाते हैं. कहते है कि जंगे उहुद में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दांत टूट गया था तो आपने हलवा खाया था इसलिये आज के दिन हलवा खाना सुन्नत है। कहा जाता है कि एक बुज़ुर्ग उवैस करनी को जब मालुम हुआ कि आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का दांत-ए-मुबारक शहीद हो गया तो उन्होने अपने दातों को पत्थर से तोड डाला और फ़िर उन्होने हलवा खाया.
 कहा जाता है कि जिसका अज़ीज़ इस साल मर गया हो तो "अरफ़ा"करे यानी शबे-बारात से एक रोज़ पहले हलवा पकाकर नियाज़ फ़ातिहा दिला दें इस तरह इसका साल का नया मुर्दा बरसों पुराने मुर्दों में शामिल हो जायेगा।

1 comment:

  1. Amin Bhai Assalam Alaikum
    Agar likhne ka shouk hai aur wo bhi Islam mazahab ke liye to pahle kuraan aur Allah ke Rasul SAW ki hadees ko pade phir likhe aur deen ki dawat de. Aapne kai jagaho per biddat likh dali hai jo jahannam ki aur le jati hai. ise log padte hai aur allah na kare isper amal kar liya to apko aur unko kitana Gunah padega. jaise ki. मस्जिदों, खानकाहों वगैरा में जमा होकर या आमतौर से सलातुल उमरी सौ रकआत (उमरी सौ रकआत), नमाज़ सलाते रगाइब (रगाइब की नमाज़), सलातुल अलफ़िआ (हज़ारी नमाज़) की नमाज़ की जाती है.
    यह भी होता है कि पन्द्रह शअबान की रात को "ईदुल अम्वात" (मुर्दों की ईद) समझ कर मुर्दों की रुहों का ज़मीन पर आने का इन्तिज़ार करते हैं।कई लोग शबे-बारात के दिन मकानों की सफ़ाई, बर्तनों की धुलाई, नये-नये कपडों को पहनते हैं, औरतें तरह-तरह के पकवान मसलन हलवा, पूडी, मसूर की दाल पकाती और नगमें गा-गा कर रात भर जागती हैं।
    कई लोग नियाज़ फ़ातिहा, कुरआन ख्वानी (कुरआन पढना), मज़ारों की धुलाई, कब्रों पर फ़ूल चढाना, गुलगुलों से मस्जिदों की ताकों को भरते हैं. कई लोग शबे बारात पर हलवा पकाते हैं. कहते है कि जंगे उहुद में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दांत टूट गया था तो आपने हलवा खाया था इसलिये आज के दिन हलवा खाना सुन्नत है। कहा जाता है कि एक बुज़ुर्ग उवैस करनी को जब मालुम हुआ कि आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का दांत-ए-मुबारक शहीद हो गया तो उन्होने अपने दातों को पत्थर से तोड डाला और फ़िर उन्होने हलवा खाया.
    कहा जाता है कि जिसका अज़ीज़ इस साल मर गया हो तो "अरफ़ा"करे यानी शबे-बारात से एक रोज़ पहले हलवा पकाकर नियाज़ फ़ातिहा दिला दें इस तरह इसका साल का नया मुर्दा बरसों पुराने मुर्दों में शामिल हो जायेगा। Allah se Daro jitan usse Darne ka haq hai. Biddat na aap karo aur na hi kisi ko karwao. KURAN AUR HADEES pado phir likho. shukriya

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