अमेरिका का दखल
अमीन कुरेशी
अपने आप को पूरी दुनिया का दरोगा समझने वाले अमेरिका का हमारे देश के मामलों में दखल अब इतना बड़ गया है कि वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. आर्थिक नीतियों, सामरिक और विदेश नीतियों में तो अमेरिका का दखल है ही अब वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. भारत में होने वाले आंदोलनों को कैसे संभाला जाए इसकी नसीहत अमेरिका ने भारत को दी है. वास्तव में अमेरिका , भारत में होने वाले आंदोलनों को हवा दे कर अस्थिरता पैदा करना चाहता है. शांति उसे सूट नहीं करती है. अशांति होने पर उसको दखल देने का मौका मिलता है. फिर उस देश पर हमला करने का वह नैतिक अधिकार बताता है. हमले के बाद उस देश के सन साधनों पर कब्ज़ा कर कठपुतली सरकार बैठाता है. इस तरह वह कई देशों में घुसपैठ कर चुका है. अब उसके निशाने पर भारत है.
यह सही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में अमरीका की ओर से मिली नसीहत पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है लेकिन यह काफी नहीं है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की नियमित ब्रीफ़िंग के दौरान प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में संयम बरतना चाहिए. विक्टोरिया न्यूलैंड से ये पूछा गया था कि भारत में आजकल नियमित प्रदर्शन हो रहे हैं और पुलिस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और भ्रष्ट राजनेताओं के ख़िलाफ़ लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचल रही है, क्या वे इससे चिंतित हैं?
इस सवाल के जवाब में अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड का कहना था- जैसा कि आप जानते हैं कि हम दुनियाभर में शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के अधिकार का समर्थन करते हैं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हम उम्मीद करते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में उचित संयम बरतेगा.
सवाल पूछने वाले ने 16 अगस्त से अन्ना हज़ारे के प्रस्तावित अनशन का भी ज़िक्र किया और कहा कि भारत के स्वतंत्रता दिवस के बाद का दिन प्रदर्शनों के हिसाब से बड़ा हो सकता है, क्योंकि इस दिन भारत में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक बड़ा प्रदर्शन होने वाला है.
लेकिन भारत ने अमरीकी विदेश मंत्रालय की टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में इसे ग़ैर ज़रूरी बताया गया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है- हम अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता का ग़ैर ज़रूरी बयान देखा है, जो उन्होंने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने पर दिया है. भारतीय संविधान में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का उल्लेख है, जिसका इस्तेमाल भारत के 1.2 अरब नागरिक करते हैं. जून में काले धन को लेकर बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे और दिल्ली पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करके अनशन बंद करा दिया था. दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की काफ़ी आलोचना हुई थी.
सवाल यह उठता है कि विक्टोरिया न्यूलैंड के सामने यह सवाल क्यों उठाया गया. क्या इस तरह के सवाल उठाने वाले पत्रकार अमेरिका के इशारे पर ही इस तरह के सवाल करते हैं. यदि सवाल पूछ भी था तो विक्टोरिया न्यूलैंड को जवाब देना था कि यह भारत का आन्तरिक मामला है. सच तो यह है कि अमेरिका को हमने सर चढ़ा रखा है. अब भी समय है संभलने का. कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो जाए.
अमीन कुरेशी
अपने आप को पूरी दुनिया का दरोगा समझने वाले अमेरिका का हमारे देश के मामलों में दखल अब इतना बड़ गया है कि वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. आर्थिक नीतियों, सामरिक और विदेश नीतियों में तो अमेरिका का दखल है ही अब वह आंतरिक मामलों में भी दखल देने लगा है. भारत में होने वाले आंदोलनों को कैसे संभाला जाए इसकी नसीहत अमेरिका ने भारत को दी है. वास्तव में अमेरिका , भारत में होने वाले आंदोलनों को हवा दे कर अस्थिरता पैदा करना चाहता है. शांति उसे सूट नहीं करती है. अशांति होने पर उसको दखल देने का मौका मिलता है. फिर उस देश पर हमला करने का वह नैतिक अधिकार बताता है. हमले के बाद उस देश के सन साधनों पर कब्ज़ा कर कठपुतली सरकार बैठाता है. इस तरह वह कई देशों में घुसपैठ कर चुका है. अब उसके निशाने पर भारत है.
यह सही है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में अमरीका की ओर से मिली नसीहत पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई है लेकिन यह काफी नहीं है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की नियमित ब्रीफ़िंग के दौरान प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में संयम बरतना चाहिए. विक्टोरिया न्यूलैंड से ये पूछा गया था कि भारत में आजकल नियमित प्रदर्शन हो रहे हैं और पुलिस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और भ्रष्ट राजनेताओं के ख़िलाफ़ लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को कुचल रही है, क्या वे इससे चिंतित हैं?
इस सवाल के जवाब में अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया न्यूलैंड का कहना था- जैसा कि आप जानते हैं कि हम दुनियाभर में शांतिपूर्ण और अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के अधिकार का समर्थन करते हैं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हम उम्मीद करते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने में उचित संयम बरतेगा.
सवाल पूछने वाले ने 16 अगस्त से अन्ना हज़ारे के प्रस्तावित अनशन का भी ज़िक्र किया और कहा कि भारत के स्वतंत्रता दिवस के बाद का दिन प्रदर्शनों के हिसाब से बड़ा हो सकता है, क्योंकि इस दिन भारत में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक बड़ा प्रदर्शन होने वाला है.
लेकिन भारत ने अमरीकी विदेश मंत्रालय की टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में इसे ग़ैर ज़रूरी बताया गया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है- हम अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता का ग़ैर ज़रूरी बयान देखा है, जो उन्होंने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने पर दिया है. भारतीय संविधान में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का उल्लेख है, जिसका इस्तेमाल भारत के 1.2 अरब नागरिक करते हैं. जून में काले धन को लेकर बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे और दिल्ली पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करके अनशन बंद करा दिया था. दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की काफ़ी आलोचना हुई थी.
सवाल यह उठता है कि विक्टोरिया न्यूलैंड के सामने यह सवाल क्यों उठाया गया. क्या इस तरह के सवाल उठाने वाले पत्रकार अमेरिका के इशारे पर ही इस तरह के सवाल करते हैं. यदि सवाल पूछ भी था तो विक्टोरिया न्यूलैंड को जवाब देना था कि यह भारत का आन्तरिक मामला है. सच तो यह है कि अमेरिका को हमने सर चढ़ा रखा है. अब भी समय है संभलने का. कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो जाए.
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