Saturday, 19 November 2011

औद्योगिक और कृषि उत्पाद के दाम

औद्योगिक और कृषि उत्पाद के दाम

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अमीन कुरेशी

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-उद्योगपति मालामाल, किसान कंगाल

-औद्योगिक उत्पाद की तरह नहीं बढ़ते कृषि उत्पाद के दाम

-अनाज के समर्थन मूल्य में होती है मामूली वृद्धि

 पुराने लोग बताते हैं कि साठ-सत्तर के दशक में ढाई क्विंटल गेंहू में एक तोला सोना मिल जाता था. आज ढाई क्विंटल गेंहू में एक ग्राम सोना ही मिलता है . आज सोने का दाम लगभग ३० हज़ार रूपए तोला है तो इस हिसाब से गेंहू का दाम १२ हज़ार रूपए क्विंटल होना चाहिए लेकिन इस वर्ष यह दाम १२८५ रूपए है. साठ-सत्तर के दशक में ही एक क्विंटल गेंहू में 121 लीटर डीजल मिलता था लेकिन आज सिर्फ 24 लीटर ही मिलता है. कहने का तात्पर्य यह है कि जिस रफ़्तार से बाकी सब वस्तुओं के दाम बढे हैं उसी रफ़्तार से कृषि उत्पाद या अनाज के दाम नहीं बढे हैं. कृषि उत्पाद और औद्योगिक उत्पाद के दामों में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है.  कृषि उत्पाद के दाम सरकार द्वारा समर्थन मूल्य से तय किये जाते हैं जबकि औद्योगिक उत्पाद के दाम उद्योगपति स्वयं तय करता है. वह तय करता है कि उसकी एंटीबायोटिक की एक टैबलेट ५० रूपए की आयेगी.  १० ग्राम की चोकलेट २० रूपए की आयेगी. एक लीटर पानी १५ रूपए का आयेगा. यही नहीं जो आलू औए टमाटर औने-पौने दामों में किसान से ख़रीदे जाते हैं उनसे बनी वैफर और सोस किस दाम पर मिलते हैं यह सभी जानते हैं. किसान के  दो रूपए किलो के आलू को २०० रूपए में बेचने के इस अर्थशास्त्र में एक तरफ किसान के श्रम की न्यूनतम कीमत है तो दूसरी तरफ पूंजी से पूंजीपति होने का रास्ता है.

कहने का तात्पर्य यह है कि एक तरफ किसान कंगाल और दूसरी तरफ उद्योगपति  मालामाल हो रहा है. क्या आपने कभी सुना है कि किसी  उधोगपति ने आत्म हत्या कर ली है. जबकि देश के १००-२०० किसान प्रत्येक वर्ष क़र्ज़ और गरीबी से तंग आकर काल के गाल समा जाते है. बीते 15 वर्षों में ढ़ाई लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. कृषि के अलाभकारी होने का क्या इससे बड़ा सबूत और क्या होगा ?

प्रत्येक पीढ़ी में उसकी ज़मीन का बंटवारा होते होते कृषि का रगबा बीघा दो बीघा पर आजाता है. इस बची खुची जमीन को भी वह कलकारखाने लगाने वाले उद्योगपति को बैच कर शहर चला आता है और यहाँ किसी गन्दी बस्ती में मरखप जाता है या उसी फक्ट्री में मजदूरी करने पर मजबूर हो जाता है.

आज ज़रूरत है किसान को कृषि उपज के भरपूर दाम देने की. किसानों की उपज का दाम सरकार बढाती है लेकिन वह ऊंट के मूह में जीरे के बराबर है. सरकार ने कृषि के दाम तय करने के लिए ' कृषि लागत व मूल्य आयोग' बनाया है लेकिन सरकार इसकी सिफारिशों को पूरी तरह मानती नहीं है. आयोग  ने वर्ष 2012-13 के लिए गेंहू के न्यूनतम समर्थन मूल्य में रुपए 230 वृध्दि का प्रस्ताव किया था लेकिन खाद्य व वित्त मंत्रालयों ने इस पर यह कहते हुए आपत्ति जताई थी कि इससे महंगाई और बढ़ जाएगी.  केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस वर्ष गेंहू के मूल्य में रुपए 115 प्रति क्विंटल वृध्दि की राय दी थी और वही मानी भी गई. गत वर्ष तो गेंहू के दामों में सिर्फ बीस रुपए प्रति क्विंटल की ही वृध्दि की गई थी. इस पर जब किसानों ने सरकारी  केंद्रों के बजाय  व्यापारियों  को गेंहू बेचना शुरु कर दिया तो  सरकार ने 50 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस भी स्वीकार किया. तब कहीं जाकर सरकारी गेंहू 1170 रुपए प्रति क्विंटल हो पाया था. कृषि संसाधनों व दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दाम आसमान छूने के बावजूद सरकार के मन में उनके प्रति कोई झुकाव नहीं है. सरकार विदेशों से सड़ा हुआ गेंहू २५०० रुपया प्रति क्विंटल खरीद सकती है, लेकिन अपने किसानों को वह 1500 रुपया क्विंटल भी देने को तैयार नहीं!

समर्थन मूल्य से गेंहू का दाम 11 पैसा प्रति किलो महंगा हो जाएगा. देश में क्या और कोई ऐसी वस्तु है जिसके दाम में महज १०-१५ पैसे प्रति किलो की वृध्दि होती हो? अनाज की मूल्य वृध्दि करते समय सरकार उसे पैदा करने वाले किसान की नहीं बल्कि उसे खरीदने वाले मध्यम वर्ग का ख्याल रखती है?  कृषि लागत व मूल्य आयोग  उपज का मूल्य निर्धारण करते समय क्या वह इसके समानान्तर अन्य क्षेत्रों के आय में हो रही वृध्दि और बाजार का ख्याल नहीं रखता?  डीजल व ऑयल, रासायनिक उर्वरक, बीज व कीटनाशक आदि के दामों में काफी वृध्दि हो चुकी है तथा बाजार में दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम कहां से कहां पहुंच गए हैं. क्या इसी के समतुल्य कृषि उपज का दाम नहीं बढ़ना चाहिए? सरकार अपने कर्मचारियों को जिस मानक से वेतन व महंगाई भत्ते की वृध्दि देती है, क्या उसी के अनुरूप किसानों को उनकी उपज का दाम नहीं मिलना चाहिए? देश में जिस तरह सीमांत किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है उससे या तो किसान सिर्फ खाने भर को ही अनाज पैदा करेंगें और बाकी का सरकार को विदेशों से दोगुनी कीमत पर आयात करना होगा. विदेशी किसानों को मालामाल करने से बेहतर है कि एक निश्चित कालखंड को मानक मान कर जिस अनुपात में आवश्यक वस्तुओं के बाजार भाव बढ़ें, देशी  किसानों के उत्पाद के भी दाम उसी अनुरूप तय कर किसान, कृषि, गाँव और इस कृषि प्रधान देश को बचाना चाहिए. आखिर विश्व आर्थिक संकट के समय इसी रीड की हड्डी के कारण भारत मजबूती से खड़ा रहता है.

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