-पत्रकार/प्रोफेसर अमीन कुरेशी-
लोकसभा की क्या ज़रुरत. देश राज्यसभा से भी चल सकता है. इसी तरह विधानसभा समाप्त कर राज्य चलाने की जिम्मेदारी विधान परिषद् को दी जा सकती है. सभी संवैधानिक संस्थान प्रमुख, चीफ जस्टिस, सरकारी विभाग के शीर्ष अधिकारी, वॉइस चांसलर, बैंक चेयरमैन इत्यादि पदेन सदस्य हो सकते हैं.
लोकसभा और विधानसभा के चुनाव बहुत खर्चीले हैं. करप्शन की जड़ हैं. समाज विभाजक हैं. हिंसक हैं. अनपढ़ और अपराधियों के अड्डे हैं. झूठे वादों के मंच हैं. लूट के तंत्र हैं. इन पर से जनता का विश्वास उठ चुका है. कोई विकल्प नहीं है. इसलिए लोग मतदान में नोटा दबाने लगे हैं. ३०-४० प्रतिशत तो वोट डालने ही नहीं जाते हैं. १०-२० प्रतिशत वोट खरीदकर या डरा कर डलवाए जाते हैं. १०-२० प्रतिशत वोट पार्टी कार्यकर्ताओं के होते हैं. इनके अपने आर्थिक और राजनीतिक कारण होते हैं.
कुलमिलाकर हमारा राजनीतिक तंत्र खोखला हो चुका है. विकल्प राज्यसभा और विधानपरिषद हो सकते हैं. विचार करके देखिये. अच्छा लगेगा. तब तक लोकसभा और विधानसभा के लिए वोटिंग करते रहिये.

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