प्रजातंत्र का पांचवां स्तम्भ
लेखक; अमीन कुरेशी
हमारे देश में प्रजातंत्र के लिए सर्व प्रथम तीन स्तम्भ मान्य किये गए. ये हैं विधायिका, न्याय पालिका और कार्य पालिका. तीनों पर नज़र रखने , जवाबदेह बनाने और आम लोगों की बात उठाने और उसे सरकार तक पहुँचाने के लिए प्रेस को प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ मान्य किया गया. लेकिन प्रेस में कुछ लालची और अन्प्रोफेश्नल लोगों के घुस जाने और पत्रकारिता एक धंधा बन जाने के कारण यह चौथा स्तम्भ अब हिलने लगा है. ऐसे में प्रजातंत्र को मजबूती देने के लिए पांचवा पिल्लर तेजी से खड़ा हुआ है. इसका नाम है आर टी आई यानि सूचना का अधिकार.
संसद द्वारा 15 जून, 2005 को पारित सूचना अधिकार अधिनियम 12 अक्तूबर, 2005 को एक कानून के रूप में लागू हुआ. भ्रटाचार को रोकने और समाप्त करने के लिये इसे बहुत ही प्रभावी कदम बताया गया । इस नियम के तहत भारत के सभी नागरिकों को सरकारी रेकार्डों और प्रपत्रों में दर्ज सूचना को देखने और उसे प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति का अधिकार है. 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने "राज नारायण विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार" मामले में कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर सकते जब तक कि वो न जानें. इसी कारण सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में छुपा है. इसी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि भारत एक लोकतंत्र है. लोग मालिक हैं. इसलिए लोगों को यह जानने का अधिकार है कि सरकारें जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं? व प्रत्येक नागरिक कर/ टैक्स देता है. यहाँ तक कि एक गली में भीख मांगने वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब वो बाज़ार से साबुन खरीदता है.(बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में). नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार खर्च हो रहा है. इन तीन सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा हैं.
सूचना का अधिकार अधिनियम ने गत पांच सालों में एक नयी क्रांति को जन्म दिया है. सरकार को और जवाबदेह बनाया है. नेताओं और अधिकारियों अर्थात विधायिका और कार्य पालिका की सांटगाँठ की पोले खोली है और कई भ्रष्टाचार उजागर किये हैं. यहाँ तक कि महाराष्ट्र में तो सरकार का तख्ता तक पलट दिया है. आदर्श सोसाईटी मामले में अशोक चव्हान को मुख्या मंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा है. सूचना अधिकार की अब तक सबसे बड़ी सफलताओं में से यह एक बड़ी सफलता है. इससे भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं और अधिकारीयों के होंश उड़ गए हैं. देश भर के नेताओं और अधिकारियों में यह सन्देश गया है कि पैसे के लालच में कुर्सी जा सकती है, जेल होगी अलग.
किस नेता ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में क्या जानकारी पहले दी और बाद के चुनाव में क्या जानकारी दी इस बात का खुलासा सूचना के अधिकार से हुआ है. कई बार अधिकारी जानकारी देने में नानकुर भी करते हैं. आर्मी ने भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे अधिकारियों से सम्बंधित सूचना आरटीआई के तहत देने से मना कर दिया है। एक आवेदक ने आरटीआई के तहत आर्मी से सूचना मांगी थी कि ब्रिग्रेडियर और उससे ऊपर के उन अधिकारीयों का विवरण दें जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के अरोपों की जांच चल रही है या पूरी हो चुकी हो। आर्मी ने सूचना देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि मांगी गई जानकारी को इतना ज्यादा है कि उसे इक्ट्ठा करना सम्भव नहीं है।
पावरफुल नेताओं और अधिकारियों की पोल खोलने का खामयाजा भी सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ता है. उनपर हमले होते हैं. कई कार्यकर्ता मारे गए हैं. यह एक चिंता का विषय बन गया है. एक स्वयंसेवी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 में महाराष्ट्र में छह आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई और कई पर हमले किए गए। गुजरात में एक आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा कि गत दिनों जान चली गयी. गिर के जंगलों में हो रहे अवैध खनन के खिलाफ जेठवा ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इसके कुछ समय बाद ही मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने गुजरात उच्च न्यायालय के नजदीक जेठवा की गोली मारकर हत्या कर दी थी। हत्या के सिलसिले में पुलिस ने एक सांसद के भतीजे को राजकोट हवाई अड्डे के पास से गिरफ्तार किया गया।
सूचना के अधिकार से प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ भी मज़बूत हुआ है. सूचना अधिकार का इस्तेमाल कर अब कई पत्रकार अपने अखबार, पत्रिका या चैनल के लिए के लिए खोजी पत्रकारिता करने लगे हैं. उटलुक पत्रिका के पत्रकार सैकत दत्ता ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए 2500 करोड़ के चावल निर्यात घोटाले का पर्दाफाश किया. सीबीआई मामले की जांच कर रही है।
आरटीआई कार्यकर्ताओं पर भी अब ऊँगली उठने लगी है. सूचना के अधिकार में भी कुछ लोग पैसा वसूलने में जुटे हैं. ये वो लोग हैं जो सूचना के अधिकार के लागू होने के पहले शिकायतकर्ता रहे हैं और शिकायत कर के छोटी मोटी वसूली करते रहे हैं. अब ये आरटीआई कार्यकर्ता बन गए हैं. ऐसे में जो सच्चे लोग हैं उनकी हिफाज़त की ज़रुरत है. कानून की सख्ती के साथ एक रास्ता यह हो सकता है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को अपने अपने शहर में मिलकर एन जी ओ बनाना चाहिए. एन जी ओ के जरिये जानकारी एकत्र करने और प्रेस तक पहुँचाने का काम करने से कोई एक आरटीआई कार्यकर्ता हिंसा का शिकार होने से कुछ हद तक बच सकता है. एन जी ओ के जरिये उन्हें सरकारी सहायता मिल सकती है.
जरुरत आरटीआई कार्यकर्ता को बचाने के साथ साथ प्रजातंत्र के पांचवें स्तम्भ को बचाने की है.
लेखक; अमीन कुरेशी
हमारे देश में प्रजातंत्र के लिए सर्व प्रथम तीन स्तम्भ मान्य किये गए. ये हैं विधायिका, न्याय पालिका और कार्य पालिका. तीनों पर नज़र रखने , जवाबदेह बनाने और आम लोगों की बात उठाने और उसे सरकार तक पहुँचाने के लिए प्रेस को प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ मान्य किया गया. लेकिन प्रेस में कुछ लालची और अन्प्रोफेश्नल लोगों के घुस जाने और पत्रकारिता एक धंधा बन जाने के कारण यह चौथा स्तम्भ अब हिलने लगा है. ऐसे में प्रजातंत्र को मजबूती देने के लिए पांचवा पिल्लर तेजी से खड़ा हुआ है. इसका नाम है आर टी आई यानि सूचना का अधिकार.
संसद द्वारा 15 जून, 2005 को पारित सूचना अधिकार अधिनियम 12 अक्तूबर, 2005 को एक कानून के रूप में लागू हुआ. भ्रटाचार को रोकने और समाप्त करने के लिये इसे बहुत ही प्रभावी कदम बताया गया । इस नियम के तहत भारत के सभी नागरिकों को सरकारी रेकार्डों और प्रपत्रों में दर्ज सूचना को देखने और उसे प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति का अधिकार है. 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने "राज नारायण विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार" मामले में कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर सकते जब तक कि वो न जानें. इसी कारण सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में छुपा है. इसी मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि भारत एक लोकतंत्र है. लोग मालिक हैं. इसलिए लोगों को यह जानने का अधिकार है कि सरकारें जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं? व प्रत्येक नागरिक कर/ टैक्स देता है. यहाँ तक कि एक गली में भीख मांगने वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब वो बाज़ार से साबुन खरीदता है.(बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में). नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार खर्च हो रहा है. इन तीन सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा हैं.
सूचना का अधिकार अधिनियम ने गत पांच सालों में एक नयी क्रांति को जन्म दिया है. सरकार को और जवाबदेह बनाया है. नेताओं और अधिकारियों अर्थात विधायिका और कार्य पालिका की सांटगाँठ की पोले खोली है और कई भ्रष्टाचार उजागर किये हैं. यहाँ तक कि महाराष्ट्र में तो सरकार का तख्ता तक पलट दिया है. आदर्श सोसाईटी मामले में अशोक चव्हान को मुख्या मंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा है. सूचना अधिकार की अब तक सबसे बड़ी सफलताओं में से यह एक बड़ी सफलता है. इससे भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं और अधिकारीयों के होंश उड़ गए हैं. देश भर के नेताओं और अधिकारियों में यह सन्देश गया है कि पैसे के लालच में कुर्सी जा सकती है, जेल होगी अलग.
किस नेता ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में क्या जानकारी पहले दी और बाद के चुनाव में क्या जानकारी दी इस बात का खुलासा सूचना के अधिकार से हुआ है. कई बार अधिकारी जानकारी देने में नानकुर भी करते हैं. आर्मी ने भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे अधिकारियों से सम्बंधित सूचना आरटीआई के तहत देने से मना कर दिया है। एक आवेदक ने आरटीआई के तहत आर्मी से सूचना मांगी थी कि ब्रिग्रेडियर और उससे ऊपर के उन अधिकारीयों का विवरण दें जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के अरोपों की जांच चल रही है या पूरी हो चुकी हो। आर्मी ने सूचना देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि मांगी गई जानकारी को इतना ज्यादा है कि उसे इक्ट्ठा करना सम्भव नहीं है।
पावरफुल नेताओं और अधिकारियों की पोल खोलने का खामयाजा भी सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ता है. उनपर हमले होते हैं. कई कार्यकर्ता मारे गए हैं. यह एक चिंता का विषय बन गया है. एक स्वयंसेवी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 में महाराष्ट्र में छह आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई और कई पर हमले किए गए। गुजरात में एक आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा कि गत दिनों जान चली गयी. गिर के जंगलों में हो रहे अवैध खनन के खिलाफ जेठवा ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इसके कुछ समय बाद ही मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने गुजरात उच्च न्यायालय के नजदीक जेठवा की गोली मारकर हत्या कर दी थी। हत्या के सिलसिले में पुलिस ने एक सांसद के भतीजे को राजकोट हवाई अड्डे के पास से गिरफ्तार किया गया।
सूचना के अधिकार से प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ भी मज़बूत हुआ है. सूचना अधिकार का इस्तेमाल कर अब कई पत्रकार अपने अखबार, पत्रिका या चैनल के लिए के लिए खोजी पत्रकारिता करने लगे हैं. उटलुक पत्रिका के पत्रकार सैकत दत्ता ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए 2500 करोड़ के चावल निर्यात घोटाले का पर्दाफाश किया. सीबीआई मामले की जांच कर रही है।
आरटीआई कार्यकर्ताओं पर भी अब ऊँगली उठने लगी है. सूचना के अधिकार में भी कुछ लोग पैसा वसूलने में जुटे हैं. ये वो लोग हैं जो सूचना के अधिकार के लागू होने के पहले शिकायतकर्ता रहे हैं और शिकायत कर के छोटी मोटी वसूली करते रहे हैं. अब ये आरटीआई कार्यकर्ता बन गए हैं. ऐसे में जो सच्चे लोग हैं उनकी हिफाज़त की ज़रुरत है. कानून की सख्ती के साथ एक रास्ता यह हो सकता है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को अपने अपने शहर में मिलकर एन जी ओ बनाना चाहिए. एन जी ओ के जरिये जानकारी एकत्र करने और प्रेस तक पहुँचाने का काम करने से कोई एक आरटीआई कार्यकर्ता हिंसा का शिकार होने से कुछ हद तक बच सकता है. एन जी ओ के जरिये उन्हें सरकारी सहायता मिल सकती है.
जरुरत आरटीआई कार्यकर्ता को बचाने के साथ साथ प्रजातंत्र के पांचवें स्तम्भ को बचाने की है.
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