विकास / लेख; अमीन कुरेशी.
मुसलमानों को अल्पसंख्यक से अलग किया जाए
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-एससी-एसटी कि तरह मुसलमानों का एक अलग वर्ग बनाया जाए.
- आईएस- आईपीएस में मुसलमानों का प्रतिशत 2 है.
-1.6% आईएफ़एस हैं और 3% आईपीएस हैं.
-सरकारी नौकरी में 6 प्रतिशत जबकि आबादी 16 -20 प्रतिशत.
-जेलों में मुस्लिम क़ैदियों की संख्या तीस से चालीस प्रतिशत तक.
-रंगनाथ मिश्र तथा सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू किया जाए.
-शांति से हो सकती है क्रांति.
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क्या मुसलमान, क्रिश्चन, सिख , जैन और पार्सिओं के बराबर इकोनोमिकाली , एजुकेश्नली , पोलिटिकली और सोशली मजबूत है . नहीं. तो फिर क्यों उन्हें अल्पसंख्यकों की लिस्ट में रखा गया है. मुसलमानों को इस लिस्ट से अलग कर एक नए वर्ग में रखा जाना चाहिए. अल्पसंख्यको के नाम से बनने वाली योजनाओं का लाभ मुसलमानों को कम अन्य संपन अल्पसंख्यक वर्ग को अधिक हो रहा है जो की सामान्य वर्ग से भी आगे है.
यहाँ तक कि अल्पसंख्यक के दर्जे में अन्य अल्पसंख्यक समाज द्वारा खोली जाने वाली शैक्षणिक संस्थाओ में समाज अपने कोटे की 50 % सीटों में अन्य अल्पसंख्यक को एड्मिसन नहीं दे सकते . सीटें खाली रह जाती हैं. सरकार के नियम ऐसे हैं कि खाली सीटें सरकार को सौंपना पड़ती हैं. मुंबई में जूनियर कालेजों के एड्मिसन में यही देखा गया है. अल्पसंख्यक कि सहूलियतो के तहत सरकर से जमींन औएर अनुदान लिया है तो उसका लाभ अन्य अल्पसंख्यक को भी मिलना चाहिए. लेकिन सरकरी नियम के तहत खाली सीटें जनरल केटेगरी से भरी जाती हैं और सरकार आंकड़े दे कर बताती है कि अल्पसंख्यकों का कितना भला किया गया है. भला जनरल केटेगरी का होता है और अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का मुद्दा उठाया जाता है.
क्या मुसलमान, क्रिश्चन, सिख , जैन और पार्सिओं के बराबर इकोनोमिकाली , एजुकेश्नली , पोलिटिकली और सोशली मजबूत है . नहीं. तो फिर क्यों उन्हें अल्पसंख्यकों की लिस्ट में रखा गया है. मुसलमानों को इस लिस्ट से अलग कर एक नए वर्ग में रखा जाना चाहिए. अल्पसंख्यको के नाम से बनने वाली योजनाओं का लाभ मुसलमानों को कम अन्य संपन अल्पसंख्यक वर्ग को अधिक हो रहा है जो की सामान्य वर्ग से भी आगे है.
यहाँ तक कि अल्पसंख्यक के दर्जे में अन्य अल्पसंख्यक समाज द्वारा खोली जाने वाली शैक्षणिक संस्थाओ में समाज अपने कोटे की 50 % सीटों में अन्य अल्पसंख्यक को एड्मिसन नहीं दे सकते . सीटें खाली रह जाती हैं. सरकार के नियम ऐसे हैं कि खाली सीटें सरकार को सौंपना पड़ती हैं. मुंबई में जूनियर कालेजों के एड्मिसन में यही देखा गया है. अल्पसंख्यक कि सहूलियतो के तहत सरकर से जमींन औएर अनुदान लिया है तो उसका लाभ अन्य अल्पसंख्यक को भी मिलना चाहिए. लेकिन सरकरी नियम के तहत खाली सीटें जनरल केटेगरी से भरी जाती हैं और सरकार आंकड़े दे कर बताती है कि अल्पसंख्यकों का कितना भला किया गया है. भला जनरल केटेगरी का होता है और अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का मुद्दा उठाया जाता है.
मुस्लिम अल्पसंख्यकों की स्थिति तमाम सरकारी सिफारिशों के बावजूद जस की तस बनी हुई है। 1870 के इंटर कमीशन की इस समुदाय के ऊपर दी गई रिपोर्ट से 140 वर्षो बाद भी मुस्लिम समुदाय की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
प्रधानमंत्री ने अक्तूबर 2005 में न्यायधीश राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में समिति बनाई थी. मुसलमानों से संबंधित सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक दशाओं का जायजा लेने के लिए बनाई गई जस्टिस राजेन्द्र सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत के विभिन्न क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय विभिन्न विकास मानकों पर काफी पीछे चल रहा है।यह समुदाय अपेक्षाकृत गरीब, अशिक्षित, शैक्षणिक सुविधाओं से दूर, नौकरियों में कमतर उपस्थित तथा स्वरोजगार के लिए बैंक ऋण लेने में भी काफी पीछे है। शहरी क्षेत्रों में तो यह समुदाय अधिकांश रूप से झुग्गी बस्तियों में रहता है, जहां सामान्य जीवन की सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
सात सदस्यीय सच्चर समिति ने देश के कई राज्यों में सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों से मिली जानकारी के आधार पर बनाई अपनी रिपोर्ट में देश में मुसलमानों की काफ़ी चिंताजनक तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में मुसलमान समुदाय आर्थिक, सामाजिक और शिक्षा के क्षेत्र में अन्य समुदायों के मुकाबले कहीं पिछड़ा है, इस समुदाय के पास शिक्षा के अवसरों की कमी है, सरकारी और निजी उद्दोगों में भी उसकी आबादी के अनुपात के अनुसार उसका प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है. रिपोर्टों के अनुसार हालांकि देश में मुसलमानों की आबादी लगभग साढ़े पंद्रह प्रतिशत है वहीं सरकारी उच्च पदों में उनका प्रतिनिधित्व छह प्रतिशत से भी कम है. चौदह ऐसे राज्य जहां मुसलमानों की संख्या अपेक्षाकृत ज़्यादा है वहां निचली अदालतों में उनका प्रतिशत आठ से भी कम है मगर देश के कई राज्यों की जेलों में मुस्लिम क़ैदियों की संख्या लगभग तीस से चालीस प्रतिशत तक है.
पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में गठित आयोग की रिपोर्ट में सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों के लिए दस फीसदी और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए पांच फीसदी आरक्षण तथा सभी धर्मो के दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की सिफारिश की गई है। उसमें अनुसूचित जाति के दर्जे को धर्म से अलग करने तथा 1950 के शैड्यूल कास्ट आर्डर को निरस्त करने की भी सिफारिश की गई है। आर्डर में पहले केवल हिंदुओं के लिए अनुसूचित जाति का दर्जा था लेकिन बाद में इसमें बौद्ध और सिख शामिल कर दिए गए। आयोग ने अल्पसंख्यकों को 15 फीसदी आरक्षण देने की गई सिफारिश के क्रियान्वयन में अत्यधिक कठिनाई पेश आने की सूरत में वैकल्पिक तरीके भी सुझाए हैं। उसने इस संबंध में कहा कि मंडल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक अन्य पिछड़े वर्गो की कुल आबादी का अल्पसंख्यक 8.4 प्रतिशत हैं, इसलिए उनकी आबादी के लिहाज से उनके लिए आनुपातिक सबकोटा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे में मुस्लिमों के लिए छह फीसदी और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 2.6 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था हो सकती है।
अल्पसंख्यक के नाम से उपलभध अनुदान औएर अन्य सुविधाओं का लाभ अन्य अल्पसंख्यक समुदाय अधिक उठा रहे हैं . आज मुसलमानों के अलावा अन्य अल्पसंख्यकों में धनवान, पढ़े-लिखे , नेता, आईएस अधिक हैं. अब सोचने कि जरुरत है. सबसे पीछे चल रहे मुसलमानों को आगे लाने की ज़रुरत मुसलामानों के साथ साथ अन्य समाज को भी है. तभी देश में शांति रह सकती है और इसी शांति से क्रांति हो सकती है. इसके लिए बेहतर होगा कि अल्पसंख्यक विभाग भंग कर एससी-एसटी की तरह मुसलमानों का एक अलग वर्ग बनाया जाए और रंगनाथ मिश्र तथा सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू किया जाए.
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