सामाजिक परिवर्तन / अमीन कुरेशी
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-न्यूज़ पेपरों में नया ट्रेंड.
-तटस्थ रिपोर्टिंग.
-क्राईम से वाकिफ.
-मुखबिरों तक पहुँच.
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-न्यूज़ पेपरों में नया ट्रेंड.
-तटस्थ रिपोर्टिंग.
-क्राईम से वाकिफ.
-मुखबिरों तक पहुँच.
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हाल ही के दिनों में अखबारों में क्राइम रिपोर्टरों में मुस्लिम युवकों की संख्या में वृद्धि दिखाई दी है. मुंबई से निकलने वाले लीडिंग न्यूज़ पेपरों में आप स्वयं इस नए ट्रेंड को देख सकते हैं. यह एक संयोग नहीं है कि किसी को बीट देना है तो किसी भी रिपोर्टर को कहीं भी लगा दो. अगर मैं मुंबई के सन्दर्भ में बात करू तो बीएमसी और मंत्रालय में यदि मराठी जानने वाले युवक को रिपोटिंग के लिए भेजा जाये तो उसकी पहुँच अधिक होगी. वह खास ख़बरें निकालने में सफल होगा. लेकिन क्राइम कि खबरों में लगातार मुस्लिम नवजवानों के नाम देख कर में सोचने पर मजबूर हूँ कि यह बदलाव क्यों और कैसे हो रहा है. क्या यह सिर्फ मुंबई में ही है या देश के अन्य अख़बारों में भी हो रहा है.
मुस्लिम युवकों के क्राइम रिपोर्टिंग में आने की कई वजहें हो सकती हैं. सबसे पहली वजह तो यह है कि अन्य लोग इस बीट को कवर न करने के लिए जल्दी तैयार नहीं होते हैं. पुलिस के प्रति युवकों की धारणा का कारण संकोच है. ऐसे में मुस्लिम युवक काम की मजबूरी के कारण यह काम करने को तैयार हो जाता हैं .
दूसरा कारण यह है कि मुंबई में पिछली घटनाओं के कारण सभी मुस्लिम युवकों के मन प्रो पुलिस नहीं हैं. दंगे, ब्लास्ट, एन्कउन्टर और हर घटना के बाद मुस्लिम समाज से अरेस्ट, लम्बी कैद , कई बार बेगुनाह साबित होकर जेलसे छूटना, या जेल में हत्या के कारण पुलिस की छवि मुस्लिम ही नहीं अन्य युवकों में किस तरह कि बन गयी है इसका अंदाज़ा अब आप खुद लगा सकते हैं. इस छवि को लेकर यदि युवक और यदि वह मुस्लिम युवक है तो वह तटस्थ रिपोर्टिंग करेगा. टीटोटलर बना रहेगा.
इसी तटस्थ रिपोर्ट को लोग पढना चाहते हैं. लोग सच्चाई जानना चाहते हैं. सच्ची ख़बरों से अख़बार का सेर्कुलेशन अधिक होता है. अख़बार को मुनाफा होता है.
दूसरा कारण यह है कि मुंबई में पिछली घटनाओं के कारण सभी मुस्लिम युवकों के मन प्रो पुलिस नहीं हैं. दंगे, ब्लास्ट, एन्कउन्टर और हर घटना के बाद मुस्लिम समाज से अरेस्ट, लम्बी कैद , कई बार बेगुनाह साबित होकर जेल
इसी तटस्थ रिपोर्ट को लोग पढना चाहते हैं. लोग सच्चाई जानना चाहते हैं. सच्ची ख़बरों से अख़बार का सेर्कुलेशन अधिक होता है. अख़बार को मुनाफा होता है.
मुस्लिम युवकों के क्राइम रिपोर्टिंग में अच्छा काम करने का एक कारण यह भी हो सकता है कि उनमे बोल्डनेस कुछ अधिक होती है. इस कारण से वे पुलिस और अपराधियों के बीच जाने और उनसे बात करने में झिजक महसूस नहीं करते हैं. इससे उनका काम आसन हो जाता है. चूँकि पुलिस के अधिकांश मुखबिर मुस्लिम समाज में होते हैं और इन लोगों तक मुस्लिम युवक आसानी से पहुँच जाते हैं और खबरी से खास खबर निकाल लाते हैं. यही खास खबर उस रिपोटर को ख़ास बना देती है.
एक सच्चाई यह भी है कि मुसलमानों में लिट्रेसी और एम्प्ल्यमेंट कि कमी के कारण क्राईम का रेट अधिक है. अपने आस पास समाज में होने वाली अपराधिक घटनाओं से एजुकेटेट यूथ पहले से वाकिफ होते हैं. मुस्लिम युवकों के क्राइम रिपोर्टिंग में अच्छा काम करने का एक कारण यह भी है.
शिक्षा और रोजगार की कमी के कारण मुस्लिम समाज में अपराध की दर अधिक है. कई मुस्लिम बहुल राज्यों की जेलों में बंद कैदियों में ३०-४० प्रतिशत मुस्लिम कैदी हैं. अपराधों के कारण इस तरह के परिवारों की आमदनी का ५० प्रतिशत हिस्सा पुलिस, वकील, कोर्ट के खर्च और रिश्वत में चला जाता है. कई बार तो इस तरह के खर्चों में गहने और घरबार तक बिक जाता है. समाज के लोगों को सरकार को साथ लेकर मुस्लिम समाज को टंटा मुक्त बनाने के लिए मोहल्ला समितियों का गठन करना चाहिए. छोटे-मोटे विवाद को मोहल्ले के लेवल पर हल करना चाहिए.
कुल मिलकर कारण चाहे जो भी हों कम से कम एम्लायर की मजबूरी के कारण ही सही मुस्लिम समाज के कुछ युवकों को जाब तो मिल रहा है. सरकर तो सिर्फ सच्चर जैसे आयोग गठित कर समझ रही है कि मुसलमानों का विकास हो गया है. कम से कम क्राइम रिपोर्टरों के कारण ही मुस्लिम समाज में यदि क्राइम कम होते हैं तो इससे पूरे समाज और देश का भला होगा. आज सरकर जितना पैसा मुस्लिम समाज में क्राइम को कंट्रोल करने में खर्च करती है उतना ही पैसा यदि तालीम, तिजारत और रोजगार देने पर खर्च करदे तो समाज का भला हो सकता है. सरकर को मुस्लिम आबादी में पुलिस थाना खोलने के बजाय स्कूल और कारखाना खोलने चाहिए. हाल ही में एक रिपोर्ट आयी है जिसमे कहा गया है कि भारत हथियार खरीदने वाला सबसे बड़ा देश है. हथियारों की होड़ में भारत ने अमेरिका और इस्राईल को मालामाल बना दिया है. यही पैसा देश में अज्ञानता और अन्याय दूर करने में लगा कर देश को खुशहाल बनाया जा सकता है.
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