खुल्ला खा दी नंगा न्हा
बहती गंगा में अब तक इतने लोग हाथ धो चुके हैं कि अब सफाई की जरूरत पड़ गई है। सफाई में भी कु छ लोग हाथ की सफाई बता देंगे।
जल-थल की सफाई के साथ देश में दिमागी सफाई और खीसे की सफाई की आपात जरूरत है। दीमागी सफाई उन लोगों की जिनके दिमाग
में कई तरह के वाद का मवाद भरा हुआ है। मवाद की बदबू बिना नहाए नेताओं से अचानक आने लगी है। साथ ही कई प्रांतों से आने वाली
अलग-अलग तरह की बदबू ने देशा को दुनिया के सामने दूषित कर दिया है। जैसे मुम्बई से प्रांतवाद की, यूपी से जातिवाद
की, गुजरात से संप्रदायवाद की, छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद की, कश्मीर से आतंकवाद की और दक्षिण से भाषावाद की।
अब आइये खीसे की सफाई पर। खीसे की सफाई उन लोगों की जिन्होेंने काली कमाई से शहर की पॉश कॉलोनी में मातृकृपा, पितृछाया
और गुरुआशीष बना कर मां-बाप को और गुरु को कलंकित किया है। पता नहीं कौन से गुरुकुल में जेब गरम करने का तवा रखा है
जो इन लोगों का रोटी सेंकना बंद नही हो रहा है। वास्तव में ऐसे लोगों अपने मकानों के नाम घूसकृपा, भ्रष्टभवन, कमिशनकुंज रखना
चाहिए। इनके बच्चों के नाम रिश्वतलाल और कुमारी करप्शन हों तो भविष्य में काम निकलवाने में आसानी होगी। इनका दफ्तर उस
ढाबे की तरह होगा जिस पर लिखा होता है खुल्ला खा दी नंगा न्हा।
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