Friday, 6 May 2016

राम दुलारी मायके गई...
बच्चों के  एक्जाम होते ही पूरे देश में एक तरह से अफरा-तफरी का माहौल होता है। टिकट तो पहले ही बुक हो जाते हैं। आखिरी पर्चा होते ही पैकिंग शुरू हो जाती है। 
राम दुलारी को मायके जो जाना है। ऐसे में राम दुलारे की धड़कन बढ़ती जाती है। अब गर्मी की छुट्टियों में उसके पसीने जो छूटने वाले हैं। जिस घर में खाना मिलता 
था वही घर अब खाने को दौड़गा। नर्म और मखमली बिस्तर पर रात भर कांटे चुभेंगे। सुबह सुबह लगने वाली नींद दूधवाले के कानफ ोडू भौंपू से टूटने वाली है। फिर
झपकी लगते ही अखबार वाले की उंगली डोरबेल पर होगी। आंखे पूरी तरह से खुलेंगी नहीं और नल से पानी आने से पूर्व निकलने वाली हवा नींद उड़ा देगी। फिर 
नाश्ता बनाना होगा और टिफिन तैयार करना होगा। 
राम दुलारी के मायके जाते ही राम दुलारे की डबल ड्यूटी शुरू हो जाती है। वह सुबह-सुबह चाय शकर का डिब्बा ढंूढ रहा होता है कि पत्नी का एसएमएस आता है-
चाय-शकर पहले-दूसरे डिब्बे मेेंं ढूंढ लेना,
और हां आटे को अच्छी तरह गूंथ लेना।
रोटी जल्दी जल्दी पलटना कहीं जल न जाए,
दूध के पास ही खड़े रहना कहीं उफन न जाए।
मिल जाएं अगर नमक-मिर्ची तो खोना नहीं,
प्याज काटते वक्त बिलकुल रोना नहीं।
अलमारी में नीचे रखा बनियान और कच्छा है,
चुन्नू को डांटना मत वह अभी बच्चा है।
अचार की केरी लाई थी उन्हें काटना है,
हापुस भेज रही हूं, बिल्डिंग में बांटना है।
पत्नी के आदेशों का पालन कर राम दुलारे ने घर के काम पूरे किए और निकल गया आॅफिस। शाम को लौटा तो देखा गैस जल रही थी। नल खुला रह जाने के कारण
टंकी खाली हो गई थी। फ्रिज में न रखने के कारण दूध फट गया था। इधर राम दुलारे पर मुसिबतों का पहाड़ टूट पड़ा था तो दूसरी तरफ उसका पड़ोसी पार्टी मना रहा था।
उसकी पत्नी मायके जो गई थी। 
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